आ अब लौट चलें
कोरोना वायरस ने सारी दुनिया को झकझोर कर रख दिया है। जहाँ एक तरफ एक महामारी के रूप में यह मानव जाति पर संकट बनकर छाया हुआ है वहीं यह पूरी दुनिया को दशकों पीछे भी ढकेल रहा है। हम भारत की बात करते हैं। भारत दुनिया की सबसे बडी जनसंख्या वाला दूसरा देश है तो जाहिर है यहां पर यदि आपसी सम्पर्क से फैलने वाली बीमारी आती है तो कुछ ज्यादा ही तबाही मचाती है। जब इस तरह की बीमारी का कोई कारगर इलाज उपलब्ध नहीं होता है तो इस तबाही को रोकने का सिर्फ एक ही तरीका बनता है वह है लाकडाउन या लोगों को घर में रहने के लिए मजबूर करना ताकि ये एक दूसरे के सम्पर्क में कम से कम आ सकें।
परन्तु इस तरह के लाकडाउन करने से पहले यदि प्लानिंग न की जाए तो इसके बहुत साइड इफेक्ट्स भी सामने आते हैं जैसा कि इस समय भारत में हो रहा है। भारत एक ऐसा देश है जहां पर कुछ राज्यों जैसे उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, बिहार, मध्य प्रदेश के ज्यादातर लोग रोजगार के सिलसिले में महानगरों दिल्ली, मुम्बई, सूरत आदि में रहते हैं। ये वो लोग हैं जो मेहनत ज्यादा करते हैं लेकिन सैलरी कम पाते हैं। विभिन्न उद्योगों या फैक्ट्रियों में काम करके ही इनका गुजारा होता है। इनकी कमाई का आधे से ज्यादा हिस्सा ये घर पे अपने परिवार को भेज देते हैं बाकी आधे से कम में रहना खाना पीना आदि का इन्तजाम होता है। आप यह समझ लीजिए कि यदि ये एक दो दिन काम न करें तो इनका शहरों में रहना भारी पडने लगता है। वहीं अगर 21 दिन या एक दो महीनों का लाकडाउन हो जाए तो समझ सकते हैं कि इनकी क्या हालत होगी।
आज आलम यह है कि ये मजदूर लाकडाउन होने और ट्रेन बसों के बन्द होने से पैदल अपने अपने गांव की तरफ भाग रहे हैं। ये जानते हैं कि पैदल ये शायद ही जिन्दा अपने घर पहुंच सकें लेकिन ये यह भी जानते हैं बिना भोजन शहरों में वैसे भी मर ही जाना है तो क्यों न अपने गाँव पहुँचने की एक नाकाम कोशिश की जाए। बाहर चलेंगे तो कोई न कोई तरस खाकर कुछ खाने पीने को दे ही देगा। यह सोचकर जब यह मजबूर मजदूर अपने दोनों कंधों पर दो बच्चे और बैग टांगकर कडी धूप में पुलिस के डंडे खाने के लिए निकलता है तो यार कसम से दिल रो देता है। ऐसा आलम देखकर किसी शायर की यह लाइनें याद आती हैं -
पत्थर के खुदा पत्थर के सनम पत्थर के इंसा पाए हैं
तुम शहर-ए-मोहब्बत कहते हो हम जान बचाकर आए हैं

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