किसानों को किसान ही रहने दो
कामन सेंस की बात है कि जो लोग ढाई महीने से कडाके की सर्दी में घर बार छोडकर आन्दोलन कर रहे हैं वो ऐसा कृत्य क्यों करेंगे कि सारी मेहनत पर पानी फिर जाए। हिंसा का रास्ता क्यों अपनाएं कि आन्दोलन का मतलब शून्य हो जाए, ऐसा भी तो नहीं कि आन्दोलन में एकदम गँवार ही बैठे हैं।इतनी समझ तो उनमें भी होगी कि हिंसा और उपद्रव उन पर विपरीत असर डालेगा। ये सब बातें सोचने पर मजबूर करती हैं। हम सब मनुष्य हैं और विवेकशील प्राणियों में गिनती होती है तो तर्क करना तो बनता है बाकी विवेकहीन व्यक्ति को तो जो सामने दिखता है वही सच होता है। 26 जनवरी को जो कुछ हुआ उसकी लाखों वीडियो सबूत के तौर पर मौजूद हैं तो इसकी उच्च स्तरीय जांच होनी चाहिए। ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूँ कि अगर आज किसान आतंकवादी साबित हो जाता है तो किसान की परिभाषा बदल जाएगी और भविष्य में किसानों को किस दृष्टि से देखा जाएगा उसकी कल्पना आप कर नहीं पाएंगे। अक्सर हम और आप फिल्में देखते हैं तो उसमें अगर कोई समाजसेवी शान्तिपूर्ण ढंग से आन्दोलन या धरना प्रदर्शन कर रहा होता है तो असामाजिक तत्व या राजनीति दल उस आन्दोलन की भीड में अपने कुछ गुंडे शामिल कर दे...