हे दलितों उठो और जागो
' दलित' एक ऐसा शब्द है जिसके सामने आते ही बरबस उन पर हुआ अत्याचार और शोषण मन को व्यथित करने लगता है। कभी कभी सोचता हूँ कि दलितों की इस हालत और पिछडेपन का जिम्मेदार कौन है ? सवर्ण ? या स्वयं दलित और उनका नेतृत्व करने वाले दलित नेता। क्योंकि किसी भी अत्याचार या शोषण से निपटने का सबसे प्रभावशाली तरीका है कि हिम्मत दिखाई जाए उसके विरोध में खडा हुआ जाए लेकिन दलितों ने कहने के बजाय सहने की आदत डाल ली । दलितों ने अपने आपको खुद कमजोर किया हुआ है। आज हम देखते हैं कि एक पढे लिखे दलित में भी आत्मविश्वास की कमी दिखाई देती है । हर दलित को चाहिए कि वो अपने आपको पहचाने ,अपनी काबिलियत को जाने और मन में एक धारणा बना ले कि हम किसी से कम नहीं है ... सारी समस्याएं अपने आप हल हो जाएंगी। इन्हीं बातों पर आधारित एक सच्चा अनुभव आपके साथ साझा कर रहा हूँ। कुछ दिन पहले बैंक में मेरे एक दोस्त का कुछ काम था तो मैं भी साथ में चला गया था। वहां पर लाइन लगी हुई थी हम लोग भी खडे हो गए और अपनी बारी का इन्तजार करने लगे । हमारी लाइन में लगभग दस लोगों के आगे एक आदमी खडा था और उसकी बारी...