हे दलितों उठो और जागो
' दलित' एक ऐसा शब्द है जिसके सामने आते ही बरबस उन पर हुआ अत्याचार और शोषण मन को व्यथित करने लगता है। कभी कभी सोचता हूँ कि दलितों की इस हालत और पिछडेपन का जिम्मेदार कौन है ? सवर्ण ? या स्वयं दलित और उनका नेतृत्व करने वाले दलित नेता। क्योंकि किसी भी अत्याचार या शोषण से निपटने का सबसे प्रभावशाली तरीका है कि हिम्मत दिखाई जाए उसके विरोध में खडा हुआ जाए लेकिन दलितों ने कहने के बजाय सहने की आदत डाल ली । दलितों ने अपने आपको खुद कमजोर किया हुआ है। आज हम देखते हैं कि एक पढे लिखे दलित में भी आत्मविश्वास की कमी दिखाई देती है । हर दलित को चाहिए कि वो अपने आपको पहचाने ,अपनी काबिलियत को जाने और मन में एक धारणा बना ले कि हम किसी से कम नहीं है ... सारी समस्याएं अपने आप हल हो जाएंगी। इन्हीं बातों पर आधारित एक सच्चा अनुभव आपके साथ साझा कर रहा हूँ।
कुछ दिन पहले बैंक में मेरे एक दोस्त का कुछ काम था तो मैं भी साथ में चला गया था। वहां पर लाइन लगी हुई थी हम लोग भी खडे हो गए और अपनी बारी का इन्तजार करने लगे । हमारी लाइन में लगभग दस लोगों के आगे एक आदमी खडा था और उसकी बारी आ भी चुकी थी। उसे शायद कुछ पैसे निकालने थे तो उसने अपनी पासबुक और अन्य दस्तावेज काउंटर पर बैठे कैशियर को दिए तो पता चला कि उसके अकाउंट में कुछ गडबडी थी तो कैशियर ने कहा कि अकाउंट बन्द है मैनेजर साहब से मिलिए एप्लिकेशन दीजिए और अपना अकाउंट रिएक्टिव कराइए ,इतना कहकर उसने उस आदमी को लौटा दिया। वह आदमी वहां मैनेजर के केविन के दरवाजे पर गया और वहां खडा हो गया।
चूंकि मुझे कोई काम था नहीं मैं तो अपने दोस्त के साथ गया था तो मेरी नजर उसी इंसान पर टिकी थी। काफी देर हो गई वह आदमी कभी केविन के पास जाता तो कभी लाइन में लगे लोगों के पास। मुझसे रहा नहीं गया मैंने पूछ ही लिया , " अरे चाचा क्या बात है कोई परेशानी है क्या ?" वो मुस्कुराते हुए बोले, हाँ वो मैनेजर साहब से मिलना था पर मुझे डर लग रहा है कहीं बिगड़ न जाएं क्योंकि मेरे खाते में सालों से लेन देन नहीं हुआ है। मैंने कहा तो जाइए डर क्यों रहे हैं जाएंगे तभी तो कुछ पता चलेगा। वो फिर गए और मैनेजर साहब के केविन के पास खडे हो गए लेकिन अन्दर जाने की हिम्मत नहीं हो रही है। मैं उनके पास गया और मैंने बोला दीजिए अपनी पासबुक और आइए मेरे साथ । मैं अन्दर गया और मैनेजर को सारी बात बताई और यह भी बताया कि किस तरह से वो आदमी केविन के अन्दर आने से डर रहे थे। मैनेजर साहब ने उस आदमी की पासबुक देखा और मुझसे बोले , " आप जानते हैं ये अन्दर आने से क्यों डर रहे थे, क्योंकि ये गौतम हैं अर्थात दलित हैं। संयोग से मैं खुद भी दलित हूँ हम दलितों की यही सबसे समस्या है हम अपने ही हक को लेने के लिए हिचकिचाते हैं और जिसका फायदा बाकी लोग जमकर उठाते हैं।मैं खुद दलित हूँ और मुझे खुशी होती है दलितों का काम करने में पर इनके जैसे लोग हैं कि पास ही नहीं आते। " फिलहाल बाकी की बातचीत हुई और हमने उनका एप्लिकेशन भी दे दिया और सारा काम करवा दिया और उन्हें समझा दिया कि जितना आप डरोगे उतना ही परेशान रहोगे। कोई भी अधिकारी हो वो आम जनता की सेवा के लिए है और उनका काम है कि वो हर छोटे बडे इंसान का काम ईमानदारी से करें।
उस दिन मैंने एक बात गौर की कि दलित कमजोर नहीं हैं और न ही सवर्ण में इतनी हिम्मत है कि वो दलितों का शोषण कर सकें। सवर्ण दलितों का शोषण करते हैं सिर्फ इसलिए कि दलितों की सोच संकुचित है, उनमें डर है कि कहीं उनसे कोई भूल न हो जाए और बाबू साहब या पंडित जी नाराज न हो जाएं। दलित कमजोर इसलिये हैं क्योंकि वो अपने आपको कमजोर समझते हैं। हम सिर्फ अनपढ़ दलितों की बात नहीं कर रहे हैं बल्कि हमने बहुत से पढे लिखे दलितों को भी देखा है जो कोई भी कार्य डर डर के किया करते हैं। अरे किसी भी मंत्री या अधिकारी के पास जाने में कैसी हिचक ? ज्यादा से ज्यादा वो क्या करेगा आपका काम नहीं करेगा ..तो न करे.. लेकिन अगर आप उसके पास जाओगे ही नहीं तो इसमें तो आपका ही दोष है न। इसलिए हे दलितों, हे पिछडों.. उठो..जागो और अपने आस पास के लोगों को जागरूक करो , उन्हें शिक्षा प्राप्त करने के लिए प्रेरित करो। बाबा अम्बेडकर साहब जैसे मसीहों का इन्तजार मत करो कि कोई आएगा और आपको शोषण से मुक्ति दिलाएगा।अपना और अपने समाज का मसीहा खुद बनो।

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