किसानों का दर्द कौन समझेगा


उत्तर प्रदेश में किसानों की हालत तो हमेशा खराब ही रहती है। पहले तो ऊँची लागत लगा कर किसी तरह खेतों में जुताई बुवाई की जाती है और जब खेतों में फसलें तैयार होने लगती हैं तो आवारा पशुओं का आक्रमण किसानों की सारी मेहनत और लागत पर पानी फेर देता है। एक एक साथ 20-20 आवारा पशु जिस खेत में पडते हैं उस खेत की सारी फसलें चौपट। किसान की सारी किसानी धरी की धरी रह जाती है। यदि दिन में  किसान किसी तरह अपने खेतों की रखवाली कर भी लेता है तो रात में ये पशु खेती का सत्यानाश करने पहुंच जाते हैं और सुबह होने पर किसान के पास सिर्फ माथा पीटने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता। कुछ किसान तार और बाँस लगाकर अपने खेतों को सुरक्षित रखने का प्रयास तो करते हैं लेकिन पशुओं की संख्या इतनी अधिक होती है कि किसी तरह की रोकथाम उन्हें खेत में प्रवेश करने से रोक नहीं पाती। अब यह भी तो मुमकिन नहीं है कि किसान अपने सारे खेतों में रोक लगा सके ताकि आवारा पशुओं से इनके खेतों की सुरक्षा हो सके।
प्रदेश सरकार ने वादे तो कर लिए कि आवारा पशुओं के लिए पशुशाला का निर्माण किया जाएगा लेकिन इस पर कुछ खास अमल नहीं हो सका है। खेतों में आवारा पशुओं की संख्या कम हो ही नहीं रही है। कुछ पशुशालाओं के मालिक तो आवारा पशुओं को पकडऩे और उन्हें पशुशाला में रखने के लिए किसानों से 500 से 1000  रुपए भी वसूल कर रहे हैं और मजबूर किसान (मरता क्या न करता) दे भी रहा है।  इससे पशुशालाओं की देखरेख करने वालों का लालच भी बढता जा रहा है और वे यदि एक दिन दस पशुओं को पकडकर ले जाते हैं तो  दस दिन बाद फिर से 15 पशु खुला छोड दे रहे हैं और दुबारा पकडऩे और पशुशाला में रखने के लिए किसानों से फिर से पैसे ऐंठ रहे हैं। कुछ किसान ऐसे खेतों में खेती करना ही छोड रहे हैं जो नदियों , बागों या जंगल के किनारे स्थित होते हैं क्योंकि ऐसी जगहों पर आवारा पशु बहुत ही ज्यादा संख्या में मिलते हैं और किसी भी फसल को एक दो इंच से ऊपर बढने नहीं देते।

हमेशा घाटे में रहने के बावजूद किसान खेती करना नहीं छोडता क्योंकि उसके पास जीवन यापन का कोई और रास्ता भी नहीं है और स्थिति यह है कि किसानों का दर्द समझने वाला कोई नहीं है। किसानों को लेकर वादे भले ही किए जाते रहे हों लेकिन सरकारी सुविधाओं और अनुदानों का फायदा भी बडे और जानकार किसान ही ले पाते हैं जबकि प्रदेश में छोटे और मध्यम किसानों की संख्या ज्यादा है और वे सारी सरकारी सुविधाओं से वंचित रह जाते हैं। सुविधाओं की बात यदि छोड भी दीजिए तो यदि छोटा या मध्यम किसान किसी तरह खेती कर रहा है  तो कम से कम आवारा खुले पशुओं से उसके खेतों में उगी फसलों की सुरक्षा के बारे सोचना सरकार की जिम्मेदारी तो बनती ही है।
कुछ स्थानों पर अभी पशुशालाओं का निर्माण कार्य प्रगति पर है तो सरकार को चाहिए कि आवारा पशुओं से आम किसान की जो खेती चौपट हो रही है उसका कुछ मुवावजा हर किसान को मिलना चाहिए ताकि किसान भूखा तो न मरे। क्योंकि अगर किसी किसान के पास एक दो खेत ही है और उसमें की भी फसलें आवारा पशुओं द्वारा खा लिया गया या नष्ट कर दिया गया तो वो किसान तो बर्बाद हो जाएगा और उसके खाने पीने के लाले पड जाएंगे। इसलिए सरकार को उन क्षेत्रों को चिन्हित करने की आवश्यकता है जहां पर आवारा पशुओं की संख्या ज्यादा है और दूर दूर तक कोई सरकारी पशुशाला नहीं है और इस स्थिति में सरकार द्वारा वहाँ के किसानों को कुछ मुवावजा अवश्य देना चाहिए साथ ही साथ खेतों की घेरबंदी के लिए कटीले तार और अन्य चीजें किसानों को मुफ्त में मुहैया कराई जानी चाहिए। हमारा भारत एक कृषि प्रधान देश है और किसान हमारे देश के विकास स्तम्भों में से एक स्तम्भ है और यह किसी भी तरह से कमजोर नहीं होना चाहिए।


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