लाचार किसान मौसम बेईमान

खेतों में  फिर से दिखी आज
जलती लाशें अरमानों की 
सरकार के संग प्रकृति बनी
है दुश्मन आज किसानों की
दूर दूर तक नीले गगन में
कहीं बारिश के आसार नहीं
लाचार बडे देखे पर किसान
जितना कोई लाचार नहीं
काट नहीं पाता किसान अरे
बोने को तो सब बोता है
जलती धरती जलती फसलें
देख बहुत मन रोता है
जिनकी मेहनत से आती है
लज्जत हम सबके खाने में
आज कोई फरियाद उन्हीं की
सुनता नहीं जमाने में
हे ईश्वर तू ही सुन ले 
अब अर्जी इन नादानों की
इससे पहले कि मिट जाए
हस्ती खेतों खलिहानों की....
इससे पहले कि मिट जाए
हस्ती खेतों खलिहानों की..
खेतों में फिर से दिखी आज
जलती लाशें अरमानों की
सरकार के संग प्रकृति बनी
है दुश्मन आज किसानों की


Comments

  1. बहुत ख़ूब ...
    सबसे ज़्यादा पिसने वाला किसान ही होता है ... चाहे प्राकृति की मार हो चाहे सरकार की ...
    अच्छी रचना ...

    ReplyDelete

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