परेशान क्यों हो भाई...किसान हो क्या
"जय जवान जय किसान " यह नारा जब हम प्राइमरी स्कूल की किताबों में पढते थे तो बडा अच्छा लगता था और गर्व महसूस होता था कि हमारे वीर जवान और मेहनती किसान हमारे देश की शान हैं लेकिन आज किसानों की जो हालत है उसे देखकर बडा दुख होता है।अब तो शहर के लोग भी तंज कसने लगे हैं कि ," इतने परेशान क्यों हो भाई...किसान हो क्या ?" सबको पता है कि आज देश का किसान बहुत परेशान है पर उनकी समस्या दूर करने के लिए कोई आगे नहीं आना चाहता।
अभी कुछ दिन पहले की बात है गाँव में सुखिया काका बहुत उत्सुकता से नहर की तरफ भागे जा रहे थे।नहर के किनारे पहुंच के देखते हैं नहर एकदम सूखी पडी है।सूखी हुई नहर देखकर उनका उत्सुकता भरा चेहरा सूखने में देर नहीं लगी। वे निराश होकर घर की तरफ लौट पडे।लौटते लौटते सोच रहे हैं कि फसल तो सूखना शुरू हो गई है नहरों में पानी नहीं है अब क्या किया जाए। तभी उन्हें ध्यान आया कि चलो एक बार बोरवेल इंजन से फसल को पानी दे देते हैं फिर अगली बार देखा जाएगा, हो सकता है तब तक नहर में भी पानी आ जाए। सुखिया काका गाँव के ही मिश्रा जी के बोरवेल पर जा पहुंचे और बोले कि पंडित जी जरा इंजन चला दीजिए खेत में फसल सूख रही है। मिश्रा जी ने पान खाते हुए सुखिया काका की तरफ घूर के देखा और पान थूकते हुए बोले , "अभी तुम्हारा पिछला पानी का हिसाब बाकी है सुखिया, वो हिसाब चुका दो तभी नया पानी मिल पाएगा।"
सुखिया काका बोले, "जी पंडित जी दे देंगे एक बार फसल तैयार हो जाए तो सबसे पहले कुछ अनाज बेच के आप ही का हिसाब करेंगे।"
मिश्रा जी सिर हिलाते हुए बोले कि ," देखो डीजल का दाम आसमान छू रहा है अब हम उधार वाला काम नहीं कर पाएंगे पानी लेना हो तो लो नहीं तो ना लो।"
इतना सुनकर सुखिया काका की रही सही उम्मीद भी टूटकर बिखर गई क्योंकि इस समय उनके पास पैसे तो थे नहीं और वे चुपचाप घर लौट आए।लगभग चार दिन बीत गए और एक दिन मैनें देखा कि वो अपने खेत के मेड पर बैठकर अपनी सत्तर प्रतिशत सूख चुकी फसल को देखे जा रहे हैं। हमसे रहा न गया हम पूछ बैठे ,"काका खेत में पानी क्यों नहीं लगा रहे हो फसल सूख गई है।" उन्होंने एक बार मेरी तरफ देखा फिर फसल देखने लगे।ऐसा लग रहा था कि वो बोलना चाह रहे थे पर मुँह में आवाज आकर अटक जा रही थी।चेहरा ऐसा सूजा हुआ था मानों रात भर रोए हैं।मैं कुछ पल वहीं खडा रहा फिर महसूस किया कि अगर मैने एक बात उनसे और पूछी तो वे फफक कर रो पडेंगे ।मैं कुछ नहीं बोला और वहां से चुपचाप चला आया। अगले दिन सुबह जब आंख खुली तो पता चला कि सुखिया काका अब नहीं रहे।
यह कहानी एक अकेले सुखिया काका की नहीं है बल्कि पिछले कुछ सालों में लाखों किसानों की कहानी बन चुकी है जिनसे अपनी बरबाद होती फसल और अनाज देखे नहीं जाते और वे मजबूर होकर आत्महत्या कर बैठते हैं।कहने को तो कहा जाता है कि भारत एक कृषि प्रधान देश है और ऐसे देश मे किसानों की ये हालत है।सरकार कहती है किसानों के लिये ये योजना जारी है या वो योजना जारी है लेकिन ये योजनाएं किसानों तक पहुंच रही हैं या नहीं यह ट्रैक करने के लिये सरकार के पास कोई सिस्टम मौजूद नहीं है।कुछ राज्यों में फ्री बोरवेल लगवाने की योजनाएं चलाने को तो चलाई गई लेकिन उसका लाभ अधिकारियों और ग्राम प्रधानों ने सिर्फ अपने चहेतों को ही दिया। असली समस्या छोटे और मध्यम किसानों के पास है लेकिन योजनाओं का लाभ सिर्फ बडे काश्तकारों (जिनको जरूरत नहीं है) को ही मिला।सरकार को पता होना चाहिए कि बडे किसान कभी आत्महत्या नहीं करते ।आत्महत्या करने वालों में ज्यादातर छोटे और मध्य स्तर के किसान हैं जिन तक सरकारी सुविधा पहुँचाने में लगभग हर सरकार नाकाम रही है।
सस्ते कर्ज के नाम पर भी किसानों के साथ सिर्फ मजाक ही किया जाता रहा है छोटे किसान अगर बैंकों से कर्ज भी लेना चाहें तो बैंकों द्वारा इतने नियम व शर्तें थोप दी जाती हैं कि ये गरीब किसान उन्हें पूरी ही नहीं कर पाते। आखिर बैंक और सरकार छोटे और मध्य वर्ग के किसानों को कर्ज उपलब्ध कराने में लचीलापन क्यों नहीं दिखाती हैं ?
सबसे ज्यादा दुख तो तब होता है जब किसान किसी तरह अनाज पैदा कर लेते हैं और उसे बेचने के लिए उपयुक्त बाजार उपलब्ध नहीं हो पाता। अनाज संग्रहण की सुविधा तो होती नहीं इसलिए किसान बरबाद होते अनाज को औने पौने दामों पर बेचने को मजबूर हो जाते हैं।कभी कभी तो ऐसा होता है कि बेचे गए अनाज से उस अनाज को पैदा करने में आई लागत भी नहीं निकल पाती। इतना सब सहने के बाद भी किसान आत्महत्या न करें तो क्या करें।
किसानों की आत्महत्या करने की घटनाएं सन् 1990 के बाद से शुरु हुई और आज तक जारी है। हर साल इन घटनाओं में वृद्धि ही हुई है।2013 और 2016 के बीच तो इन घटनाओं ने रिकॉर्ड ही तोड दिया है। इस बीच हर साल लगभग 12000-15000 किसानों ने आत्महत्या की। 2016 के बाद के रिकॉर्ड अभी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं हैं लेकिन अब तक के रिकॉर्ड को देखते हुए तो यही अनुमान लगाया जा सकता है कि इन सालों में किसानों की आत्महत्या की घटनाएं बढी ही होंगी। इन रिकार्ड्स को देखते हुए हम कह सकते हैं कि हमारे देश के किसान बहुत दयनीय स्थिति में हैं और इनकी सहायता के लिए हम सबको एक साथ आना होगा।अगर आप एक जिम्मेदार नागरिक हैं तो यह मुद्दा हर जगह जरूर उठाएं और ज्यादा से ज्यादा लोगों तक शेयर करें और किसानों की स्थिति सुधारने में अपना कीमती योगदान करें।
सत्यम को कचोटती कहानी,दिल को छू गई,सच ही है ये यकीनन सिस्टम के मारे लोग हैं जिनका कसुर बस गरीब होना होता है।
ReplyDeleteअंतर्मन को एक टीस सी दे गई आपकी कहानी। कुछ चुभ सा गया। ऐसा लगा मानो हमारे आसपास की ही कहानी है। 21वीं सदी के भारत में भी अभी तक ऐसी प्रशासनिक व्यवस्थागत विसंगतियां हैं। आपकी कहानी लोकतंत्र के कर्णधारों तक पहुंचे ऐसी कामना है। बहुत ही सुंदर लेखक महोदय।
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