उसको मेरी परवाह नहीं तो क्या

उसको मेरी खुशियों की

परवाह नहीं तो क्या

मुझको तो उसकी मुस्कुराहटों की फिक्र है

उसकी कहानी में कहीं मैं हूँ भी या नहीं 

मेरी हर  दास्ताँ में बस उसी का जिक्र है

तनहा सी जिन्दगी में 

यूँ खोया हुआ था मैं

ना मकसद था कोई

न थी कोई मंजिल

देखा उसे पहली दफा

तो कुछ अपने सा लगा

सच होता हुआ जैसे

कोई सपना सा लगा

आज उसके लिए धडकन

यूँ बेकरार है मेरी

मैं नाव हूँ कोई तो

वो पतवार है मेरी

वो सोचे न सोचे

मेरे भी बारे में कभी

मेरी तो सोच सोच में 

वो ही समाया है

हर पल उसी की याद

दिन हो चाहे रात

रब  जाने उसने कैसा

मुझपे जादू चलाया है

कि 

हरसू फैला उसकी ही

आहट का इत्र है

घूमता नजरों में हरपल

उसी का चित्र है

कितना विचित्र है

उसको मेरी खुशियों की

परवाह नहीं तो क्या

मुझको तो उसकी मुस्कुराहटों की फिक्र है

उनकी कहानी में कहीं मैं हूँ भी या नहीं

मेरी हर दास्ताँ में बस उसी का जिक्र है

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