सरकार के मारे, बीएड टीईटी उत्तीर्ण बेचारे
उत्तर प्रदेश में 2011 से ही बीएड और टीईटी उत्तीर्ण अभ्यर्थियों का मानसिक शोषण हो रहा है और उनकी आवाज सुनने वाला कोई नहीं है। सरकार कुछ सुनना नहीं चाहती और अदालतों में इंसाफ का दम घुट सा गया है, कुछ ऐसा ही प्रतीत होता है। ये अभ्यर्थी जब जब धरना प्रदर्शन करके अपनी आवाज सत्तारूढ़ सरकार तक पहुँचाने की कोशिश करते हैं उन्हें पुलिस की लाठियां ही खाने को मिलती है।
कुछ ऐसा ही हुआ कल अर्थात 29 मई को जब लखनऊ में बीएड टीईटी उत्तीर्ण अभ्यर्थी अपनी मांगों को लेकर प्रदर्शन कर रहे थे। उनकी मांगें सुनने की जगह उन पर लाठीचार्ज करके बेतहाशा लाठियां बरसाई गई जिसमें लगभग 12 लोग गम्भीर रूप से घायल हो गए। पुलिस और सरकार द्वारा अभ्यर्थियों पर की गई यह कार्यवाही बेहद शर्मनाक और निन्दनीय है। आखिर इंसाफ के लिए धरना प्रदर्शन न किया जाए तो क्या किया जाए। प्रदर्शनकारियों की मांगों को जानबूझकर अनसुना किया जाता है ताकि वे आक्रोशित हों कानून को अपने हाथ में लें , और पुलिस तथा सरकार को मौका मिल जाए उन पर लाठीचार्ज करने का और उनके संगठन एवं एकता को तितर बितर करने का।
लगभग सात साल से प्राइमरी की इस 72825 अध्यापकों की भर्ती को पूरा न करके सरकार अभ्यर्थियों के साथ नाइंसाफी कर रही है जिसकी वजह यह है कि पात्र होते हुए भी हजारों अभ्यर्थी सडकों पर धरना प्रदर्शन करने को मजबूर हैं और अपात्रों (शिक्षामित्रों) को पात्रता साबित करने के लिए मौके पर मौके और सहूलियत पर सहूलियत दी जा रही है। सबसे बडा सवाल यही उठता है कि जब पहले से आपके प्रदेश में योग्य और पात्र अभ्यर्थी मौजूद हैं तो फिर अपात्रों को इतने मौके देने की क्या जरूरत है ? अगर सिर्फ वोट हासिल करने के लिए कोई सरकार इंसाफ का गला घोंट रही है तो ऐसी सरकार को सत्ता में रहने का कोई हक नहीं है।
शुरू से ही 2011 के बीएड टीईटी उत्तीर्ण अभ्यर्थियों के साथ सौतेला व्यवहार और नाइंसाफी होती आई है और देखना है कि कब तक नाइंसाफी और तानाशाही जीतती है और कब तक ये अभ्यर्थी झूठे वादे और दिलासा के नाम पर छले जाते हैं। आखिर सरकार इस भर्ती की बाकी बची हुई सीटों पर नियुक्ति क्यों नहीं करना चाहती यह एक बडा सवाल है जिसका जवाब देने से हर मंत्री और अधिकारी कतराते रहते हैं।
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