तूतीकोरिन में हिंसा भडकी: स्टरलाइट प्रोटेस्ट
तमिलनाडु के तूतीकोरिन में हालात बिगडते ही जा रहे हैं। लगभग तीन महीने से शान्तिपूर्ण तरीके से स्टरलाइट कापर प्लांट का विरोध कर रहे लोगों का सब्र अचानक मंगलवार को टूट गया और वे हिंसक हो गए ,तोडफोड करने लगे और बसों को आग लगा दी। विकराल रूप से भडकी हुई इस भीड को पुलिस ने आँसू गैस का इस्तेमाल करके रोकने का प्रयास किया मगर वे असफल रहे और अन्त में फायरिंग करनी पडी जिसकी वजह से लगभग 11 लोगों की मौत हो गई और 30 से भी अधिक प्रदर्शनकारी घायल हो गए। हालांकि इसके बाद माहौल कुछ शान्त जरूर हुआ मगर लोगों में तनाव की स्थिति बनी हुई थी और आज यानी बुधवार को एक बार फिर हिंसा भडक गई जिसमें एक की मौत और तीन लोग घायल हो गए।
प्रदर्शन कर रहे लोगों का कहना है कि इस प्लांट से जो प्रदूषण फैल रहा है उसकी वजह से वहां के स्थानीय लोगों को तरह तरह की स्वास्थ्य सम्बन्धित बीमारियां जैसे सांस फूलना, मितली आना या उल्टी होना बढती ही जा रही हैं इसलिए इस प्लांट का बन्द होना जरूरी है।
क्या है स्टरलाइट इण्डस्ट्री ?
दरअसल दुनिया की बडी बडी खनन कम्पनियों में से एक भारतीय कम्पनी है जिसका नाम है "वेदांता" , और इसी वेदांता समूह की एक कम्पनी का नाम है स्टरलाइट जो तमिलनाडु के तूतीकोरिन और सिलवासा में स्थापित है जो तांबे का उत्पादन करती है । सिर्फ तूतीकोरिन के प्लांट से इसके द्वारा सालाना लगभग साढे चार लाख टन तांबे का उत्पादन होता है।
घटना के बाद तमिलनाडु के मुख्यमंत्री ई.के. पलानीस्वामी ने इसकी न्यायिक जांच के आदेश दिए हैं और साथ ही साथ मृतकों के परिवार वालों को दस दस लाख और सरकारी नौकरी तथा घायलों को तीन तीन लाख रुपये देने का ऐलान किया है।
तमाम लोग इसे सरकार की लापरवाही का परिणाम बता रहे हैं और कई सवाल भी हैं जो सरकार को कटघरे में खडा करते हैं जैसे ,अगर लोग इस कम्पनी का विरोध पिछले तीन महीनों से शान्तिपूर्वक कर रहे थे तो उनकी बातें आखिर क्यों नहीं सुनी गई ? अगर सवाल लोगों की सेहत और जीवन से जुडा है तो इसका निवारण सबसे पहले क्यों नहीं किया गया ? अगर पुलिस के पास फायरिंग का ही विकल्प बचा था तो फिर रबर की बुलेट्स का इस्तेमाल करना जरूरी क्यों नहीं समझा गया ?
जब लगातार स्टरलाइट कम्पनी के द्वारा उत्पन्न प्रदूषण से लोगों को तकलीफ हो रही थी तो इसकी जांच क्यों नहीं की गई ?
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