भोजन को बरबाद न होने दें
लोग कहते हैं कि दो वक्त की रोटी बहुत किस्मत वालों को ही नसीब होती है वरना इस दुनिया में करोड़ों लोग ऐसे भी हैं जिन्हें हर रोज सिर्फ एक ही वक्त का खाना मिल पाता है। आजकल भारत में शादियों का माहौल है और हर शादी में इतना सारा खाना बरबाद हो जाता है जिससे कि सैकडों लोगों की भूख मिट सकती है।
एक बार मैं एक स्टेशन पर अपने एक दोस्त को छोडने गया था तो देखा कि दो बच्चे कूडेदान में फेंके गए खराब खाने को लेकर इस तरह से खा रहे थे जैसे कि बेचारे बरसों के भूखे हों।उसी दिन शाम को मैनें एक शादी का प्रोग्राम अटेंड किया ।शादी में जब सब खाना खा रहे थे तो मैनें देखा कि कुछ लोग खाना लेते, थोडा सा खाते और फेंक देते ,फिर दूसरे आइटम की तरफ जाते खाना लेते, थोडा सा खाते और फिर बचा हुआ फेंक देते। इस तरह मैनें एक घण्टे में इतना खाना खराब होते देखा जिससे कि लगभग पचास लोग पेट भर कर खाना खा सकते थे। यह सब मैं देख ही रहा था कि अचानक मुझे उन दो बच्चों की याद आ गई जिनको मैनें स्टेशन पर बासी खराब खाना खाते देखा था।
बेशक उन मासूमों पर बहुत ज्यादा तरस आ रहा था मुझे पर उससे भी ज्यादा मुझे उन लोगों पर गुस्सा आ रहा था जो खाने को बेतहाशा बरबाद कर रहे थे। लोगों को समझना चाहिए कि बरबाद हुआ यह खाना किसी काम का नहीं होता । कुछ तो कुत्ते खा पीकर तितर बितर कर देते हैं और कुछ तालाबों या नालियों में फेंक दिया जाता है।इस बारे में सोचने की जरुरत है कि आखिर इस तरह खाना बरबाद करने से हमें क्या मिलता है। यदि हम थोडी सी समझदारी दिखाएं तो इस खाने से न जाने कितने लोगों की भूख मिट सकती है, न जाने कितने लोगों को दोनों वक्त का भोजन नसीब हो सकता है।
किसी भूखे को खाना खिलाने से सबसे पहला अच्छा काम तो यह होता है कि भोजन का सही उपयोग हो जाता है और दूसरी चीज ऐसा करने से आप बहुत ही पुण्य का काम करते हैं। बहुत से लोगों को मैनें देखा है कि पुण्य करने या ईश्वर को खुश करने के नाम पर मंदिरों और मस्जिदों में महँगे चढावे चढाते हैं जबकि सच तो यह है कि ईश्वर तो खुद सबको सब कुछ देता है, भला उसे इन महँगे चढावों की क्या जरूरत । मंदिरों और मस्जिदों में महँगे महँगे चढावे चढाने से कहीं बेहतर है कि हम उसी पैसों से कुछ गरीबों की मदद कर दें या उनको भोजन करा दें क्योंकि ये सब करने से ईश्वर ज्यादा और जल्दी खुश होता है।
यह आर्टिकल लिखने का मेरा सिर्फ इतना ही उद्देश्य है कि आप लोग शादियों में खाने के स्टाल से उतना ही खाना लें जितना कि खा सकें जिससे खाने को बरबाद होने से रोका जा सके । शादियों में उतना ही खाना बनाया जाए जितने कि जरूरत हो ।फिर भी यदि कुछ खाना बच जाता है तो उसे तालाबों या नालियों में न फेंककर गरीबों में बाँट दिया जाए ताकि उस बचे हुए भोजन का सही उपयोग हो सके और माँ अन्नपूर्णा का अपमान न हो।
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