सारे दलित एक हों

  इलाहाबाद में हुई दलित छात्र की नृशंस हत्या और हत्या के बाद पुलिस प्रशासन की आनाकानी यह साबित करती है कि यूपी ही नहीं पूरे देश में कहीं भी दलित और पिछडे लोग सुरक्षित नहीं हैं। आखिर क्यों ऐसा होता है कि जब भी  कोई दलित किसी के अत्याचार का शिकार होता है तो हर बार उसे इंसाफ के लिए नाक रगडनी पडती है। इसकी वजह है दलितों में एकता का न होना। संख्या में अधिक होने के बावजूद भी पिछडे और दलितों की कहीं पर भी सुनवाई आसानी से नहीं होती है और यह कमी दलितों और पिछडों का नेतृत्व करने वाले नेताओं की नेतृत्व क्षमता पर सवाल उठाती है।आखिर क्यों खुद को दलितों और पिछडों का नेता कहने वाले लोग दलितों और पिछडों को इकट्ठा नहीं कर पा रहे हैं ? क्या दलितों और पिछडों के नेताओं का काम सिर्फ इतना है कि पीडित परिवार को आकर सांत्वना दें और चलते बनें ?

किसी दलित पर यदि कोई बडी जाति का इंसान कोई अत्याचार करता है तो उस दलित की एफआईआर तक नहीं लिखी जाती है। तमाम धरना प्रदर्शन करने के बाद किसी तरह यदि एफआईआर लिखी भी गई तो कुछ दिन बाद आक्रोश खत्म होने पर उसे भी ठण्डे बस्ते में डाल दिया जाता है। ऐसा एक बार नहीं हर बार होता है। इलाहाबाद के दिलीप सरोज की ही तरह अभी कुछ दिन पहले प्रतापगढ़ के पट्टी क्षेत्र के  एक लाइनमैन अशोक कुमार गौतम की आन ड्यूटी हत्या कर दी गई थी और बताया गया कि अचानक हार्ट अटैक आने से उसकी मौत हुई लेकिन जब घरवालों ने उसके शरीर पर चोट और घाव के निशान देखा तो आश्चर्यचकित रह गए , कोतवाली गए तो एफआईआर दर्ज करने से मना कर दिया गया , तमाम धरना प्रदर्शन करने  के बाद एफआईआर दर्ज की गई और फिर सब ढण्डे बस्ते में।  दलितों के कुछ नेता भी रिश्तदारों की तरह  सांत्वना देने आए और खा पीकर चले गए।

आखिर दलितों की आवाज इतनी दबी सी क्यों है ? दलितों की आवाज़ दबी है या ऊँची जाति के अफसर उनकी आवाज सुनना नहीं चाहते ?  कुछ भी हो लेकिन.. हे देश भर के दलितों और पिछडों अब जाग जाओ । खुद सत्ता में आओ और खुद अपना इंसाफ करो । जो तुम्हारे पिछडेपन और दलित होने की वजह से तुमसे नफरत करते हैं , तुम्हें अछूत कहते हैं, तुम्हारे टच हो जाने भर से जो जाकर स्नान करते हैं , उनसे किसी भी तरह के इंसाफ की उम्मीद मत करो। 

 शायद अब वह समय आ गया है जब भारत के सारे पिछडे और दलित वर्ग के लोगों को एकजुट होना पडेगा। अगर चाहते हो कि आपके साथ इंसाफ हो , कानून आपका साथ दे तो आगे आओ , संगठन बनाओ , खुद को इतना मजबूत बनाओ कि कोई तुम्हारे साथ नाइंसाफी न कर पाए। देश में कहीं भी किसी भी दलित या पिछडे इंसान के साथ कोई भी अत्याचार हो सबको मिलकर इंसाफ के लिए लडना है और इंसाफ की कुर्सी पर बैठे हर छोटे बडे अफसर या जज  को यह एहसास दिलाना है कि अब दलित बेईमानी और नाइंसाफी बिल्कुल भी बर्दाश्त नहीं करेंगे।

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