EVM पर घमासान

अभी अभी हाल ही में सम्पन्न हुए विधानसभा चुनाव में मिली करार हार पर ,हारी हुई पार्टियों ने अपना गुस्सा जीती हुई पार्टी के साथ साथ  ईवीएम अर्थात् इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन पर उतारा है। सबसे पहले बसपा प्रमुख  मायावती  ने बयान दिया था कि ईवीएम के साथ छेडछाड की गयी है और जो वोट उन्हें मिलना चाहिए था वह भाजपा को ट्रांसफर हो गया है ।उसके बाद एक एक करके कई पार्टियों और नेताओं ने ईवीएम पर विरोध जताना शुरू कर दिया है।अखिलेश यादव ने भी कह दिया कि ईवीएम छेडखानी मामले में वो भी बुआ जी के साथ हैं। इसके बाद तो अरविन्द केजरीवाल ,लालू प्रसाद यादव व अन्य भी इस मामले में मायावती के समर्थन में आगे आ रहे हैं। सवाल यह उठता है कि क्या वाकई में ऐसा है सकता है ? चुनाव कराने की सारी जिम्मेदारी शुरू से अन्त तक चुनाव आयोग की होती है और भारतीय  चुनाव आयोग इतना ढीला ढाला  भी नही है कि ऐसी गलती हो जाए। अगर इन नेताओं की बातों में थोडी भी सच्चाई है तो वे इसे साबित क्यों नही कर रहे हैं । कहीं ऐसा तो नही कि इस तरह ईवीएम की विश्वसनीयता पर सवाल उठाकर वो अपनी हार से उठने वाले सवालों को दबाने की कोशिश कर रहे हैं।चुनाव होने से पहले हर एक ईवीएम की अच्छी तरह से विशेषज्ञों द्वारा जाँच परख की जाती है उसके बाद ही इसे प्रयोग हेतु अप्रूव किया जाता है।अगर ईवीएम का इस तरह से दुरुपयोग सम्भव होता तो शायद भारत में इसका प्रयोग ही नही हो रहा होता। ईवीएम से बहुत सारे फायदे होते हैं इसीलिए इसे अपनाया गया है।
ईवीएम के फायदे:
अगर भारत में चुनाव के लिए ईवीएम को अपनाया गया है तो उसका मुख्य कारण है समय की बचत। पहले के चुनाव के तरीके में पारदर्शिता तो थी लेकिन उसमें एक वोट डालने में कम पढा लिखा वोटर ज्यादा समय लगाता था साथ ही बहुत सारे वोट अनवैलिड और खराब भी हो जाते थे जबकि ईवीएम में एक भी वोट खराब नही होता है।इसके अलावा बूथ कैप्चरिंग और सुरक्षा की दृष्टि से भी पुरानी व्यवस्था कम ठीक थी ।कभी कभी ऐसा भी होता था कि एक दो वैलेट बाक्स ही गायब कर दिए जाते थे जबकि ईवीएम में ऐसा नही होता है।
कुछ कम जानने वाले लोगों का कहना है कि ईवीएम को हैकरों द्वारा हैक कर लिया गया था और हारने वाली पार्टियों के  40% से 50% वोट विजयी पार्टी के खाते में डाल दिया गया। इन लोगों के लिए यह जानना जरूरी है कि ईवीएम में इन्टरनेट कनेक्शन नहीं होता है इसलिए दूर से किसी दूसरे सिस्टम या माध्यम से इसे हैक नही किया जा सकता है। दूसरा सवाल यह है कि ईवीएम को हैक किसने किया होगा ? भाजपा ने या कांग्रेस ने ? मान लीजिए अगर आपको लगता है कि भाजपा के विशेषज्ञों ने ईवीएम के साथ छेडछाड की थी तो सिर्फ यूपी और उत्तराखण्ड में ही क्यों जीत हासिल कर पाए पंजाब और गोवा (फिलहाल गठबन्धन से भाजपा ही सरकार बनाने जा रही है ) में क्यों नही ? अजी जिस तरह से उनके द्वारा यूपी और उत्तराखण्ड में दूसरों के वोट अपने खाते में डाले गये (हारी पार्टियों के अनुसार) उसी तरह पंजाब और गोवा में भी तो कर सकते थे। उसी तरह कांग्रेस भी अगर ईवीएम का सहारा लेती तो पंजाब में ही क्यों बहुमत हासिल करती बाकी राज्यों में क्यों नही और गोवा में ही क्यों सबसे ज्यादा सीटें जीत सकी , यूपी और उत्तराखण्ड में क्यों नही जीती ?
अगली बात यह कि कौन सी ईवीएम किस जिले में , किस जिले से किस ब्लाक में और किस ब्लाक से किस बूथ पर जाएगी इसका फैसला भी आखिरी समय में होता है  तो कोई किस तरह से ईवीएम में गडबडी कर सकता है। मान लीजिए कि  अगर पहले से ही सभी ईवीएम में छेडछाड की गई थी तो सारी की सारी सीटों पर विजयी पार्टी ही जीतती मगर बहुत सारी ऐसी भी सीटें हैं जहाँ से उसे पराजय भी देखनी पडी है।
इसके अलावा जिस दिन वोट पडता है उस दिन सुबह सबसे पहले हर पार्टी के एजेन्ट अपनी अपनी पार्टी की तरफ से पहला वोट डालकर इस बात से आश्वस्त होते हैं कि उनका डाला गया वोट उनकी अपनी पार्टी के खाते में पहुँचा या नही।  जब सारे एजेन्ट आश्वस्त हो जाते हैं कि ईवीएम सही तरीके से काम कर रही है उसके बाद ही वोटिंग प्रक्रिया  शुरू की जाती है। वोटिंग प्रक्रिया शुरू होने के बाद वोटर के अलावा  किसी एजेन्ट या अधिकारी का ईवीएम के पास जाना सख्त मना होता है। इस दौरान सिर्फ एक अधिकारी ईवीएम के पास जा सकता है वो भी तब जब ईवीएम की बैट्री डिस्चार्ज हो जाए और उसे बदलने की जरूरत हो।
सवाल उठता है कि जब सुबह किसी एजेन्ट ने ईवीएम पर आपत्ति नही जताई और दिन भर वहीं मौजूद भी रहे तथा वोट पडने के बाद कडी सुरक्षा में हर बूथ से ईवीएम को जिला मुख्यालय पहुँचाया गया तो फिर ईवीएम में गडबडी कब और कैसे आ गयी ?
सवाल और संदेह तो बहुत हैं हर हारी पार्टी के पास जिसकी बदौलत वो ईवीएम का विरोध कर रहे हैं मगर अपना संदेह हकीकत में बदलने के लिए किसी के भी पास  कोई ठोस आधार नही है। चुनाव आयोग तो लोगों को आमंत्रित करता है कि आप आइए और हमें ईवीएम की कमियों के बारे में बताए ताकि उसे दुरुस्त किया जा सके। हालाँकि हर ईवीएम को प्रयोग में लाने से पहले चुनाव आयोग पूरी तरह से जाँच पडताल करता है और हर तरह से आश्वस्त होने के बाद ही किसी ईवीएम को प्रयोग के लिए अप्रूवल देता है। फिर भी अगर लोग ईवीएम की विश्वसनीयता पर सवाल उठा रहे हैं तो उनके सवालों और संदेहों का निराकरण होना भी जरूरी है। जो पार्टियाँ और नेता ईवीएम पर सवाल उठा रहे हैं उन्हें चुनाव आयोग और कोर्ट को यह भी बताना चाहिए कि उनके संदेह का आधार क्या है ? उन्हें बताना चाहिए कि ईवीएम में गडबडी की गई है तो किस तरह से की गई है और कब की गई है? ऐसा भी नही है कि आप सब नेता लोग अपना आरोप सिद्ध करने के लिए आर्थिक रूप से सक्षम नही हैं। आप सब देश विदेश से विशेषज्ञ और ईवीएम जानकारों को बुलाकर सिर्फ कोर्ट के सामने साबित कर दीजिए कि किस तरह से ईवीएम द्वारा एक पार्टी का वोट दूसरी पार्टी को ट्रांसफर किया जाता है इसके बाद आप खुद देखिए कि किस तरह चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट एक्शन लेता है।
ईवीएम की विश्वसनीयता पर भारत में ही सवाल उठाना कोई ताज्जुब की बात नही है।विदेशों में भी इस तरह के सवाल उठते रहते हैं।अभी कुछ ही दिन पहले अमेरिका में जो राष्ट्रपति का चुनाव हुआ उसमें डोनाल्ड ट्रंप की अप्रत्याशित जीत से क्षुब्ध होकर हिलेरी क्लिंटन के समर्थकों ने भी ईवीएम पर सवाल उठाए थे। उनके सवाल सिर्फ सवाल रह गए , तमाम विशेषज्ञों के रहने के बावजूद भी कोई साबित नही कर सका कि ईवीएम ने किस तरह डोनाल्ड ट्रंप की मदद की।




हम किसी भी तरह से ईवीएम का सपोर्ट नही करते हैं  हम सिर्फ सच के साथ हैं।हम चाहते हैं कि जो कुछ भी हो न्याय के साथ हो।हम ही नही बल्कि देश का हर नागरिक जिसने वोट दिया है वो उत्सुक होगा सच जानने के लिए कि क्या वाकई में ईवीएम का विरोध उचित है ।यदि सिर्फ अपनी हार अपनी नाकामी छुपाने के लिए ही ईवीएम का विरोध किया जा रहा है तो ये भी पूरी तरह से शर्मनाक है। अगर हारने वाली पार्टियाँ ईवीएम के विरोध में कोई ठोस सबूत प्रस्तुत करती हैं तो चुनाव आयोग और कोर्ट का यह उत्तरदायित्व है कि इस मामले की सीबीआई जाँच कराए क्योंकि यह कोई छोटा मुद्दा नही है।  यदि एक बार ईवीएम में इस तरह के डिफेक्ट का आरोप साबित होता है तो भारत के साथ साथ कई अन्य देशों की राजनीति ( जहाँ ईवीएम का इस्तेमाल होता है) में भूचाल आ जाएगा और भूतकाल में ईवीएम से हुए हर चुनाव पर सवाल उठ खडा होगा । अगर किसी भी तरह से ईवीएम में कोई छेडखानी ,मेन्युफैक्चरिंग डिफेक्ट या अन्य खामी पायी जाती है तो इस पर तुरन्त रोक लगनी चाहिए तथा आरोपी व्यक्ति या पार्टी पर कडी कार्रवाई की जानी चाहिए और चुनाव फिर से करवाने चाहिए क्योंकि यही उचित और संवैधानिक होगा।

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