आज की सशक्त महिला
एक जमाना था जब महिलाओं को घर से बाहर नही निकलने दिया जाता था और ये समझा जाता था महिलाएं सिर्फ और सिर्फ घरों में काम और चूल्हा चौका करने के लिए ही बनी है और जो महिलाएं हिम्मत करके बाहर काम करने के लिए निकलती थीं उन्हें गलत तरीके से देखा जाता था । हालाँकि आज भी कई पिछडे इलाकों में महिलाओं के साथ यह अन्याय जारी है लेकिन समय के साथ ज्यादातर समाजों की सोच में परिवर्तन आ चुका है । सिर्फ शहरों में ही नही बल्कि गांवों में भी महिलाएं पुरानी सोच और मान्यताओं से आगे निकल रही है और समाज भी इस परिवर्तन को स्वीकार कर रहा है।
8 मार्च महिला दिवस के रूप में मनाया जाता है पर इसका इसका मतलब ये नही है कि एक ही दिन हम महिलाओं के बारे में सोचें ।महिला दिवस तो हर दिन होना चाहिए क्योंकि हर दिन इनकी स्थिति में सकारात्मक परिवतर्न हो रहा है।भारत में ऐसी कोई जगह नही है ,ऐसा कोई विभाग या पद नही है जहाँ पर महिलाओं ने अपने आपको पुरुषों के बराबर साबित नही किया है।चाहे वो भारत का सर्वोच्च पद राष्ट्रपति का हो जिसे श्रीमती प्रतिभा देवी सिंह पाटिल ने सुशोभित किया और अन्य अलग अलग राजनैतिक दलों से मायावती, स्व. जयललिता,सुषमा स्वराज,शीला दीक्षित,ममता बनर्जी,स्मृति ईरानी जैसी प्रभाशाली महिलाओं ने ये सिद्ध किया है कि आज कि महिला किसी पुरुष से किसी तरह भी कम नही है।इसके अलावा अन्य क्षेत्रों से भी सानिया मिर्जा, साइना नेहवाल, पी.वी.सिन्धु,दीपिका कुमारी,मिताली राज,अंजुम चोपडा,दीपा मलिक, न जाने कितनी महिलाओं ने देश से लेकर विदेश तक हमारे देश का नाम रोशन किया है।साथ ही साथ मेडिकल,इंजीनियरिंग,फिल्म,पुलिस,जल सेना,थल सेना,वायु सेना, विज्ञान हर क्षेत्र में महिलाएं बेहतर से बेहतर प्रदर्शन कर रही हैं ।अभी, ये जरूर है कि अब भी संख्या के हिसाब से हर क्षेत्र में पुरुषों का प्रतिशत ज्यादा है महिलाओं का प्रतिशत कम पर महिलाएं भी जैसे जैसे अपने अधिकारों के प्रति जागरुक हो रही हैं इनकी संख्या में इजाफा हो रहा है।
महिलाओं को आत्मनिर्भर और सशक्त बनाने में सबसे ज्यादा योगदान सिनेमा ने किया है।पिछले कुछ वर्षों से बालीवुड में भी नारी केन्द्रित फिल्में बन रही हैं जिससे समाज में महिलाओं के सम्बन्ध एक सकारात्मक संदेश जा रहा है ।फिल्मों में सफल अभिनेत्रियाँ हर लडकी को आदर्श रूप में उन्हें आगे बढने की प्रेरणा दे रही हैं।
हालाँकि आज भी महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार, बलात्कार,दहेज उत्पीडन और भेदभाव जैसी समस्याएं भी भारत में काफी ज्यादा हैं और यह सब महिला सशक्तिकरण के रास्ते में बाधक हैं ।ये सब शासन और प्रशासन की कमियों का नतीजा है।ये केन्द्र सरकार और राज्य सरकारों दोनों का कार्य है कि देश की महिलाओं को ऐसा सुरक्षित माहौल दें कि वो बिना किसी डर या भय के अपने भारत के किसी भी हिस्से में किसी भी समय घूम फिर सकें और लक्ष्य को प्राप्त कर सकें।भारत सरकार की तरफ से महिलाओं की सुरक्षा के लिए वर्तमान में जो भी सिस्टम हैं उसमें बहुत सी कमियाँ हैं जिनमें सुधार की सख्त आवश्यकता है।
लैंगिक असमानता ने महिलाओं को काफी हद तक आगे बढने से रोका है
हालाँकि महिलाओं ने हर क्षेत्र में अपनी काबिलियत का लोहा जरूर मनवाया है लेकिन सिर्फ उन्हीं महिलाओं ने जिनको मौका मिला है । हमारे भारत में पूरी आबादी का एक हिस्सा ऐसा भी है जो आज भी महिलाओं को पुरुषों से कमतर ही आँकता है और वह हिस्सा है भारत का ग्रामीण इलाका।आप अगर किसी गांव का दौरा करें तो पायेंगे कि हर गांव में दो चार घरों को छोडकर बाकी परिवारों की लडकियाँ आज भी उच्च शिक्षा प्राप्त नही कर पाती जबकि उन्हीं परिवारों के लडके उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे होते हैं।आखिर क्यों ? लडकों और लडकियों में ये भेदभाव क्यों है ? शायद इसका जवाब यही होगा कि गांवों में अब भी लोग यही समझते हैं कि लडकियाँ पढ लिख के क्या करेंगी उन्हें तो शादी करके घर परिवार ही सम्भालना है।समाज की इस सोच ने ही गांवों में महिलाओं को चाहरदीवारी में बांध कर रखा है।ऐसी सोच वाले परिवारों को ये समझना होगा कि जिस कामयाबी या सफलता की उम्मीद वो अपने लडकों से कर यहे हैं उस उम्मीद पर उनकी लडकियाँ भी खरा उतरने की काबिलियत रखती है।
जब कोई पढी लिखी लडकी शादी करके अपनी ससुराल आती है तो हर लडकी सोचती है कि वह अपने पति घर वालों की हर तरह से मदद करे।इसलिए जब वो आगे की पढाई या नौकरी करने की बात करती है तो घर वालों को बडा अजीब लगता है और कहते हैं कि लोग क्या कहेंगे।पति महोदय को तो अपनी पत्नी का नौकरी करना बेइज्जती सी लगती है।इन सब के अलावा न जाने कितनी तरह तरह की बातें घर में होना शरू हो जाती है और मजबूर होकर एक योग्य टैलेन्टेड लडकी को भी अपनी ख्वाहिशों को अन्दर दबाना पडता है ।यही वजह है कि बहुत सी महिलाएं जो जीवन में कुछ करना चाहती हैं और आगे बढना चाहती हैं शादी ब्याह जैसे बंधनों से दूर ही रहना चाहती है।
INDIAN ACADEMY OF SCIENCES OF NATIONAL INSTITUTE OF ADVANCED STUDY ने 2010 में एक रिपोर्ट प्रकाशित की ,इस रिपोर्ट के अनुसार विज्ञान में शोध कर रही चौदह प्रतिशत महिलाओं ने शादी नही की है जबकि पुरुषों का ये प्रतिशत सिर्फ 2.5 ही है।इससे आप खुद अन्दाजा लगा सकते है कि महिलाएं किस तरह से अपने काम और कैरियर के लिए समर्पित हैं।हम जिस लैंगिक असमानता की बात कर रहे हैं वो असमानता गांवों में ही ज्यादा है आज ग्रामीण समाज की इसी सोच को बदलने की जरूरत है।
महिलाओं को अपनी क्षमता को पहचानने की जरूरत है:
ऐसी लडकियाँ और महिलाएं जिनमें कुछ करने की काबिलियत है उनमें ऊर्जा भरने की जरूरत है उन्हें अपनी ताकत पहचाननी होगी ,समाज के नियमों को तोडकर आगे आना होगा और सबको बताना होगा कि लडकियाँ लडकों से किसी भी तरह से कमजोर नही हैं ।अपने अधिकार और अपने स्वाभिमान की रक्षा हेतु खुद लडना होगा ,खुद अपने अनुरूप फैसले लेने होंगे,हो सकता है ये दुनिया आपके फैसलों का सम्मान न करे मगर आपको डटे रहना है जब तक कि मंजिल हासिल न हो जाए।
पिछले एक दो दशक से जिस तरह से महिलाओं ने कबिलियत में पुरुषों को चुनौती दी है मैं महिलाओं के बारे में निम्न लाइनें कहना चाहूँगा--
मजबूत इरादों वाली आज की नारी:
गया जमाना जब सब कहते थे अबला बेचारी है
मजबूत इरादों वाली आज की नारी है
दिन प्रतिदिन इक नई ऊँचाई चढती जा रही हैं
लडकियाँ बस आगे ही आगे बढती जा रही हैं
टूट रही घर आंगन की अब चाहरदीवारी है
मजबूत इरादों वाली आज की नारी है
जहाँ जहाँ पहुँचे हैं पुरुष पहुँची वहाँ वहाँ ये
पा जाएं गर थोडी मदद तो छू लें आसमाँ ये
हर इक बाधा इनकी दृढ़ इच्छा से हारी है
मजबूत इरादों वाली आज की नारी है
कोई भी आफत हो या कोई भी मंजर हो
मैदान हो या राजनीति या फिर अपना घर हो
अच्छी तरह निभा रही ये अपनी जिम्मेदारी है
मजबूत इरादों वाली आज की नारी है
गया जमाना जब सब कहते थे अबला बेचारी है
मजबूत इरादों वाली आज की नारी है।
हम युवाओं की जिम्मेदारी:
पहले के समाज ने और उनकी पुरानी सोच ने महिलाओं के साथ किस तरह का बर्ताव किया हमें उसे भूलना होगा।पुराना समय पुराने लोगों का था इसलिए उन्होंने वो किया जो उन्हें सही लगा। अब आने वाला समय हमारा है हमें अपनी सोच बदलनी है ,महिलाओं को सम्मान की नजर से देखने की जरूरत है क्योंकि वो इसकी हकदार है।अपनी पत्नी, बहनों और बेटियों का साथ देना है ,उन्हें आगे बढने के लिए सपोर्ट करना है और उनको हर वो मौका देना है जिसकी वो हकदार है।हमें उन्हें परम्परागत बंदिशों से आजाद करना है, उन्हें उस पिंजडे से आजाद करना है जिसमें वो अब तक कैद थीं,उन्हें भरोसे का पंख देना है ताकि वो अपनी सफलता की उडान भर सकें।
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