होली - मस्ती के रंग

भारत एक त्योहारों का देश माना जाता है। यहाँ ऐसा कोई महीना ऐसा नही होता है जब एक या दो त्योहार न पडते हों।होली भारत के मुख्य त्योहारों में से एक है ,यह रंगो का त्योहार है और यह माना जाता है कि यह लोगों के जीवन में अगले एक साल के लिए खुशियों के रंग भर के जाता है।होली का त्योहार बसन्त ऋतु में मनाया जाता है जबकि चारों तरफ सिर्फ सुन्दरता ही सुन्दरता बिखरी होती है क्योंकि ये वो मौसम होता है जब खेतों में सरसों के खूबसूरत पीले फूल खिले होते है।ऐसा लगता है कि धरती माँ ने हरे,धानी और पीले रंग की चुनरी ओढ रखी है।साथ ही साथ इस मौसम में तापमान भी अपनी परफेक्ट अवस्था में होता है अर्थात न तो गर्मी और न ही सर्दी । सच पूछिए तो होली की तैयारी बसन्त पंचमी से ही शुरू हो जाती है ।शहरों में तो नही लेकिन गांवों में बच्चे बसन्त पंचमी के ही दिन रेड़ का पेड उस जगह पर ले जाकर गाड देते हैं जहाँ पर होलिका दहन होना होता है और उसी दिन से बच्चे धीरे धीरे हर घर से गोबर के उपले और लकडियाँ इकठ्ठा करना शुरू कर देते है और होलिका दहन के दिन बच्चों की इन छोटी छोटी तैयारियों में बडे लोग हाथ बँटाकर इनकी  तैयारी पूरी कर देते हैं।भारत में होली का ये पर्व दो दिन मनाया जाता है । पहले दिन होलिका जलती है जिसमें सब लोग मिलकर लकडियाँ और गोबर के उपले इकठ्ठा करते हैं,बहनें भाइयों को उबटन लगाती हैं और बचा हुआ उबटन भाइयों के चारों तरफ घुमा के उनकी नजर उतारती हैं तथा उसे जलती हुई होलिका में फेंक देती हैं और दूसरे दिन सुबह से सब एक दूसरे को अबीर गुलाल, और रंग लगाकर सारे गिले शिकवे मिटाकर गले मिलते हैं।
फिर भी कुछ लोग ऐसे भी होते है जो होली के दिन भी अपने अहम की वजह से अपने नाराज भाई या दोस्त को मना नही पाते ।ऐसे लोगों से मैं कहना चाहूंगा कि होली का त्योहार होता ही है गिले शिकवे मिटाने के लिए, और अपनों को मनाने में अगर आपका ईगो या Attitude आपको रोकता है तो ऐसा ईगो या Attitude त्याग देना ही बेहतर है क्योंकि ये अपनों से बढ के तो नही होते न।कवि रहीमदास जी ने भी कहा है कि- रूठे सुजन मनाइए जो रूठे सौ बार,रहिमन फिरि फिरि पोइए टूटे मुक्ताहार।

होलिका दहन का इतिहास-
हमारे हिन्दू समाज में होलिका दहन के पीछे पुरानी मान्यता है कि पुराने समय में हिरण्यकश्यप नाम का राक्षस हुआ करता था जिसे वरदान मिला था कि वह न तो दिन में मरेगा न रात में,न इंसान द्वारा मरेगा न किसी जानवर द्वारा, न देव द्वारा न दैत्य द्वारा और न ही धरती पे मर सकता है न ही आसमान में।इस वरदान को पाकर वह लोगों पर अत्याचार करने लगा और देवतागण भी उससे खौफ खाने लगे। उसे मिले अद्वितीय  वरदान की वजह से कोई भी उसके सामने टिक नही पाता था। धीरे धीरे उसका आतंक इतना फैल गया कि वह अपने आपको भगवान समझने लगा। फिर उसके घर एक पुत्र का जन्म हुआ जिसका नाम उसने प्रहलाद रखा। प्रहलाद बचपन में ही बहुत धार्मिक प्रवृत्ति का था या यूँ कहिए कि राक्षस कुल में जन्म लेने के बावजूद उसमें राक्षसों वाला कोई अवगुण नही था और साथ ही साथ वह  नारायण अर्थात भगवान विष्णु का अनन्य भक्त था। हिरण्यकश्यप को जब यह बात पता चली कि उसका स्वयं का पुत्र ही उसे छोडकर किसी और की पूजा आराधना करता है तो वह बहुत क्रोधित हुआ और प्रहलाद को समझाने का प्रयत्न किया कि वही भगवान है लेकिन प्रहलाद ने उसे भगवान मानने से इनकार कर दिया।
इस पर वह इतना क्रोधित हुआ कि कई बार प्रहलाद के प्राण लेने के असफल प्रयास किये ।तभी हिरण्यकश्यप की बहन जिसका नाम होलिका था ,उससे मिलने आयी। होलिका को भी ये वरदान मिला था कि आग उसे जला नही सकती बशर्ते कि वह अपने इस वरदान का दुरुपयोग न करे। हिरण्यकश्यप ने अपनी प्रहलाद वाली समस्या होलिका को बताई तो होलिका ने कहा कि कोई बात नही भैया मैं आपकी समस्या का समाधान कर दूंगी आप सिर्फ बहुत सारी लडकियाँ इकठ्ठा करके आग जलवा दीजिए। हिरण्यकश्यप ने भी वैसा ही किया जैसा कि उसकी बहन होलिका ने कहा था। आग जल गयी और होलिका प्रहलाद को अपनी गोद में लेकर आग के बीचों बीच बैठ गई।फिर देखते ही देखते होलिका जलने लगी जबकि प्रहलाद को एक आँच तक आई ।थोडी देर बाद होलिका जल कर राख हो गई और प्रहलाद सही सलामत आग से बाहर आ गए।सारे नगरवासियों के चेहरे पर खुशी की लहर दौड गई। सत्य और धर्म की जीत हुई और अधर्म और पाप की हार ।उसी दिन से धर्म की अधर्म पर जीत के प्रतीक के रूप में हर साल होलिका दहन शूरू हो गया और आज भी वह परम्परा चली आ रही है।

सावधानियाँ भी जरूरी हैं-
होलिका दहन से लेकर  धुलेंदी तक बहुत ही खुशनुमा माहौल बना रहता है लेकिन इस माहौल में थोडी बहुत सावधानियाँ बरतनी भी जरूरी होती हैं अन्यथा इन खुशियों भरे पलों को समस्या में बदलते देर नही लगती जैसे--
●होलिका दहन होते समय कभी भी बच्चों को आग के पास नहीं जाने देना चाहिए क्योंकि बच्चे होते ही है शरारती इसलिए एक दूसरे से मस्ती करते समय उनके आग में गिरने का डर रहता है।
●रंग और गुलाल की होली खेलने से पहले अपने शरीर पर सरसों का तेल अच्छी तरह से लगा लें ताकि रंगों का बुरा प्रभाव शरीर पर न पडे और धोते समय रंग आसानी से छूट भी जाए।
●बाजार में रंग खरीदते समय यह ध्यान देना जरूरी है कि आप सिर्फ प्राकृतिक रंग ही खरीदें क्यों रसायन वाले रासायनिक रंग चेहरे और हाथों को नुकसान पहुँचा सकते हैं।
●अगर हो सके तो ज्यादातर गुलाल से ही होली खेलें और किसी को अगर रंग नही लगवाना है तो उसके साथ जबरदस्ती न करे़ क्योंकि होली प्यार का त्योहार न कि जबरदस्ती का।
● भूल कर भी किसी के ऊपर कालिख या इंजन से निकला काला जला हुआ मोबिल न डालें क्योंकि ये सभ्य लोगों को शोभा नही देता।
●हाथों में अगर रंग लगा हो या गुलाल लगा हो तो बिना अच्छी तरह हाथों को धोए कुछ खाना पीना नही चाहिए।
●भांग का इस्तेमाल अगर आपने कभी नही किया है तो बेहतर होगा आप इस्तेमाल न ही क्योंकि करें क्योंकि ज्यादातर लोगों को पता नही होता कि भांग की कितनी  मात्रा उनके लिए ठीक है कितनी नही, इसलिए कई लोग ओवरडोज की वजह से अस्पताल भी पहुँच जाते हैं।
●किसी के चेहरे पर गुलाल या रंग लगाते समय यह ध्यान रखें उनकी आँखों को नुकसान न पहुँचे।
●पानी बहुत ही कीमती होता जा रहा है इसलिए होली में कोशिश करें कि कम से कम पानी इस्तेमाल हो और हो सके तो सूखे रंग या गुलाल से ही होली खेलें।

होली का महत्व-
होली का भारत में बहुत ही महत्व है क्योंकि इस त्योहार से लोगों में आपसी कडवाहट दूर होती है ।इंसान चाहे छोटा हो या बडा सब कुछ भूलकर एक दूसरे को रंग लगाते हैं और गले मिलते हैं।दरअसल, होली जैसे त्योहारों ने हमारी संस्कृति को बचा कर रखा है  क्योंकि जब छोटे लोग अपने बडों को गुलाल लगाकर बिना भेदभाव बडे अदब से उनके पैर छूते हैं तो लगता है कि हाँ हम भारतीयों में अभी भी नैतिक मूल्य और संस्कार भरे पडे है।दुनिया कितनी भी आधुनिक क्यों न हो जाए जब तक हमारे देश में हमारे त्योहार रहेंगे हमारे संस्कार और हमारी संस्कृति जिन्दा रहेगी।

Comments

Popular posts from this blog

BS-3 वाहन- डिस्काउंट के पीछे का सच

E-श्रमिक कार्ड बन रहा है

किसानों को किसान ही रहने दो