फतवा और मुस्लिम महिलाएं
'फतवा' शब्द सुनते ही लोगों के मन में नकारात्मक या डरावने विचार आने लगते हैं क्योंकि ज्यादातर लोगों की यह सोच होती है कि किसी विषय या व्यक्ति के लिए फतवा जारी होने का मतलब है सम्बन्धित व्यक्ति की हत्या करने या उसे नुकसान पहुँचाने के लिए धमकी या चेतावनी देना । जबकि यह पूरी तरह से सत्य नही है ।
फतवा इस्लाम धर्म में एक अरबी शब्द है जिसका अर्थ होता है किसी विषय पर अपनी राय देना। जब इस्लाम के जानकारों को लगता है कि किसी व्यक्ति की किसी हरकत या उसके किसी काम से इस्लाम को मानने वालों की धार्मिक भावनाएं आहत हो सकती हैं या वह काम इस्लाम , कुरान और शरिया के कानून और नियमों के खिलाफ है या उस काम से इस्लाम को मानने वाले अन्य लोगों पर बुरा प्रभाव पड सकता है तो इस्लाम के जानकारों या मौलवियों द्धारा सख्त लफ्जों में उस काम को न करने की हिदायत दी जाती है , इसी दी गई हिदायत को इस्लाम में 'फतवा' कहा जाता है। फतवा कोई ऐसा फरमान नही है कि इसे हर हाल में माना ही जाए । जिस व्यक्ति के खिलाफ फतवा जारी होता है अगर उसे लगता है कि उसके द्वारा किया गया कार्य सही है और उसका यह कार्य किसी को नुकसान नही पहुँचा रहा है तो वह अपना काम जारी रख सकता है।
फतवा इस्लाम धर्म में एक अरबी शब्द है जिसका अर्थ होता है किसी विषय पर अपनी राय देना। जब इस्लाम के जानकारों को लगता है कि किसी व्यक्ति की किसी हरकत या उसके किसी काम से इस्लाम को मानने वालों की धार्मिक भावनाएं आहत हो सकती हैं या वह काम इस्लाम , कुरान और शरिया के कानून और नियमों के खिलाफ है या उस काम से इस्लाम को मानने वाले अन्य लोगों पर बुरा प्रभाव पड सकता है तो इस्लाम के जानकारों या मौलवियों द्धारा सख्त लफ्जों में उस काम को न करने की हिदायत दी जाती है , इसी दी गई हिदायत को इस्लाम में 'फतवा' कहा जाता है। फतवा कोई ऐसा फरमान नही है कि इसे हर हाल में माना ही जाए । जिस व्यक्ति के खिलाफ फतवा जारी होता है अगर उसे लगता है कि उसके द्वारा किया गया कार्य सही है और उसका यह कार्य किसी को नुकसान नही पहुँचा रहा है तो वह अपना काम जारी रख सकता है।
अभी अभी इंडियन आइडल की एक प्रतिभागी 16 वर्षीय लड़की नाहिद आफरीन के खिलाफ एक साथ 46 मौलवियों ने फतवा जारी किया है और हिदायत दी है कि उन्हें गाना नही गाना चाहिए और स्टेज शो करने से तो बिल्कुल ही बचना चाहिए । इस्लाम के जानकारों द्वारा जारी इन फतवों ने बहुत सारे सवाल खडे कर दिए है।
पहला सवाल तो यह कि ज्यादातर फतवे सिर्फ महिलाओं के खिलाफ ही क्यों जारी किये जाते हैं । क्या महिलाओं को अपनी मर्जी से जिन्दगी जीने का हक नही है? क्या महिलाएं सिर्फ पर्दे में रहकर पुरुषों की सेवा करने के लिए और उनकी हवस की भूख मिटाने के लिए ही बनी हैं ? जी नही ,अगर अब तक ऐसा होता भी रहा है तो अब नही हो सकता ।कोई भी नियम और कानून महिलाओं से उनका "समानता " का हक नही छीन सकता । यदि मौलवियों को लगता है कि एक लडकी के गाने से अन्य मुस्लिम लडकियाँ भी गीत संगीत की दुनिया की तरफ आकर्षित होंगी तो यह सच भी है लेकिन मुस्लिम पुरुषों के गाने से भी तो मुस्लिम लडके और लडकियाँ गीत संगीत की तरफ आकर्षित हो सकते हैं तो आप सब ने मुस्लिम लडकों को गाने से क्यों नही रोका ? नियम तो हर इंसान के लिए एक समान होने चाहिए फिर आपके नियमों में असमानता क्यों है? अगर एक मुस्लिम पुरुष नौकरी कर सकता है तो मुस्लिम महिला भी नौकरी करने की आजादी की हकदार है, मुस्लिम पुरुष गाने गा सकते हैं तो मुस्लिम महिलाओं को भी गीत संगीत सीखने का हक है यही देश के संविधान में भी है और कोई भी धार्मिक नियम देश के संविधान के नियम से बढकर नही होना चाहिए।
दूसरा सवाल यह है कि क्या भारत में ही इस्लाम के सारे नियम लागू होते हैं ।पाकिस्तान जोकि 90% से ज्यादा मुस्लिम आबादी वाला देश है वहाँ भी तो बहुत सारी अनगिनत मुस्लिम महिलाएं फिल्म, गायन, स्टेज शो प्रोग्राम जैसे क्षेत्रों से जुडी हुई हैं वहाँ पर उन्हें कोई रोक क्यों नही है । क्या वहाँ का इस्लाम धर्म और उसके नियम भारत के इस्लाम धर्म और उसके नियम से अलग हैं? इसके अलावा दुनिया में बहुत से मुस्लिम देश हैं जहाँ पर लोगों को पूरी आजादी है फिल्मों में काम करने की और गाने की।
तीसरा सवाल यह है कि फतवे सिर्फ अच्छे काम करने से रोकने के लिए या देश की प्रतिभाओं को दबाने के लिए ही क्यों जारी किये जाते हैं बुरे कामों को रोकने के लिए इतनी सख्ती से फतवे जारी क्यों नही किए जाते?
एक तरफ तो कहते हैं कि लडकियों और महिलाओं को पर्दे में ही रहना चाहिए जबकि बहुत सी मुस्लिम बस्तियां ऐसी भी हैं जहाँ आज भी शौचालय नही हैं साफ सफाई नही है , वहाँ पर शौचालय बनवाने और साफ सफाई रखने के लिए फतवे क्यों नही जारी किए जाते ? क्यों नही हिदायत दी जाती लोगों को कि खुले में शौच न जाएं और अपनी औरतों और लडकियों की इज्जत को परदे में छुपा कर रखें। कभी सख्ती से ये फतवा जारी नही किया गया कि मुस्लिमों को आतंकवाद से दूर रहना चाहिए क्योंकि यह इंसानियत के खिलाफ है और यदि एक मुस्लिम आतंकवादी बना तो अन्य मुस्लिमों पर इसका बुरा प्रभाव पडेगा और वो भी कुछ पैसों के लिए इसकी तरफ आकर्षित होंगे साथ ही साथ पूरी मुस्लिम कौम को भी बदनाम करेंगे। क्या ये सब इस्लाम और शरिया के नियम कानून के खिलाफ नही है क्या यह सब हमें नुकसान नही पहुँचाता है।
चौथा सवाल यह है कि जब सारी दुनिया और सारे धर्म महिलाओं को पुरुषों के बराबर हक, सम्मान, अधिकार और आजादी प्रदान करने की वकालत करते हैं तो इस्लाम धर्म में इतनी कट्टरता क्यों हैं ? क्यों यह धर्म महिलाओं के मामले में इतना सख्त है? कोई भी धर्म इंसानों के द्वारा और इंसानों के लिए ही बनाया जाता हैं। वही धर्म सर्वश्रेष्ठ होता है जिसके नियमों में लचीलापन हो और जो अपने मानने वालों को चाहे वह स्त्री हो या पुरुष सबको एकसमान अधिकार और आजादी दे और जो सख्त नियम और कानून हों वह सब पर एक ही तरीके से लागू हों। जबकि इस्लाम में महिलाओं के साथ सबसे ज्यादा भेदभाव होता है , हर नियम में उन्हें बांधकर रखा गया है ।पुरानी मुस्लिम महिलाओं के बारे में नही कह सकते क्योंकि वे इन नियमों की आदी हो चुकी हैं मगर आज की पीढी की पढी लिखी मुस्लिम लडकियों की राय अगर ली जाए तो ज्यादातर लडकियाँ पर्दा प्रथा, तीन तलाक, और हर बात पर फतवा जारी कर देने के नियमों को पसन्द नही करती हैं और जो पसन्द करती भी होंगी वो आस्था और विश्वास से नही बल्कि एक डर की वजह से ही पसन्द करती है।
दूसरा सवाल यह है कि क्या भारत में ही इस्लाम के सारे नियम लागू होते हैं ।पाकिस्तान जोकि 90% से ज्यादा मुस्लिम आबादी वाला देश है वहाँ भी तो बहुत सारी अनगिनत मुस्लिम महिलाएं फिल्म, गायन, स्टेज शो प्रोग्राम जैसे क्षेत्रों से जुडी हुई हैं वहाँ पर उन्हें कोई रोक क्यों नही है । क्या वहाँ का इस्लाम धर्म और उसके नियम भारत के इस्लाम धर्म और उसके नियम से अलग हैं? इसके अलावा दुनिया में बहुत से मुस्लिम देश हैं जहाँ पर लोगों को पूरी आजादी है फिल्मों में काम करने की और गाने की।
तीसरा सवाल यह है कि फतवे सिर्फ अच्छे काम करने से रोकने के लिए या देश की प्रतिभाओं को दबाने के लिए ही क्यों जारी किये जाते हैं बुरे कामों को रोकने के लिए इतनी सख्ती से फतवे जारी क्यों नही किए जाते?
एक तरफ तो कहते हैं कि लडकियों और महिलाओं को पर्दे में ही रहना चाहिए जबकि बहुत सी मुस्लिम बस्तियां ऐसी भी हैं जहाँ आज भी शौचालय नही हैं साफ सफाई नही है , वहाँ पर शौचालय बनवाने और साफ सफाई रखने के लिए फतवे क्यों नही जारी किए जाते ? क्यों नही हिदायत दी जाती लोगों को कि खुले में शौच न जाएं और अपनी औरतों और लडकियों की इज्जत को परदे में छुपा कर रखें। कभी सख्ती से ये फतवा जारी नही किया गया कि मुस्लिमों को आतंकवाद से दूर रहना चाहिए क्योंकि यह इंसानियत के खिलाफ है और यदि एक मुस्लिम आतंकवादी बना तो अन्य मुस्लिमों पर इसका बुरा प्रभाव पडेगा और वो भी कुछ पैसों के लिए इसकी तरफ आकर्षित होंगे साथ ही साथ पूरी मुस्लिम कौम को भी बदनाम करेंगे। क्या ये सब इस्लाम और शरिया के नियम कानून के खिलाफ नही है क्या यह सब हमें नुकसान नही पहुँचाता है।
चौथा सवाल यह है कि जब सारी दुनिया और सारे धर्म महिलाओं को पुरुषों के बराबर हक, सम्मान, अधिकार और आजादी प्रदान करने की वकालत करते हैं तो इस्लाम धर्म में इतनी कट्टरता क्यों हैं ? क्यों यह धर्म महिलाओं के मामले में इतना सख्त है? कोई भी धर्म इंसानों के द्वारा और इंसानों के लिए ही बनाया जाता हैं। वही धर्म सर्वश्रेष्ठ होता है जिसके नियमों में लचीलापन हो और जो अपने मानने वालों को चाहे वह स्त्री हो या पुरुष सबको एकसमान अधिकार और आजादी दे और जो सख्त नियम और कानून हों वह सब पर एक ही तरीके से लागू हों। जबकि इस्लाम में महिलाओं के साथ सबसे ज्यादा भेदभाव होता है , हर नियम में उन्हें बांधकर रखा गया है ।पुरानी मुस्लिम महिलाओं के बारे में नही कह सकते क्योंकि वे इन नियमों की आदी हो चुकी हैं मगर आज की पीढी की पढी लिखी मुस्लिम लडकियों की राय अगर ली जाए तो ज्यादातर लडकियाँ पर्दा प्रथा, तीन तलाक, और हर बात पर फतवा जारी कर देने के नियमों को पसन्द नही करती हैं और जो पसन्द करती भी होंगी वो आस्था और विश्वास से नही बल्कि एक डर की वजह से ही पसन्द करती है।
कुल मिलाकर इतना ही कहा जा सकता है कि 21वीं सदी में पहुँच जाने के बाद भी हमारे समाज की महिलाओं के बारे में जो सोच है वह बिल्कुल भी अच्छी नही है ।अभी "महिला दिवस" को हमने महिलाओं के सम्मान में बहुत बडी बडी बातें की थी कि महिलाएं आत्मनिर्भर हो रही हैं, उन्हें सम्मान मिल रहा है, समाज की सोच बदल रही है ,वगैरह वगैरह। 'महिला दिवस' को बीते हुए अभी मुश्किल से दो हफ्ते भी नही हुए हैं और एक लडकी के खिलाफ एक साथ 46 फतवे जारी हो गये जिसने महिला दिवस को हमारे द्वारा किए गए ,महिलाओं की दशा में सुधार के सारे दावों को खारिज कर दिया और हमें एहसास दिला दिया कि महिलाओं को आजाद होने में अभी कुछ और वक्त लगेगा। 16 वर्षीय नाहिद ने इन 46 फतवों के खिलाफ गाने और स्टेज शो करने की जो हिम्मत दिखाई है वह वास्तव में काबिल-ए-तारीफ है, यही छोटी सी हिम्मत न जाने कितनी लडकियों की हिम्मत बढाने मे सहायक होगी। नाहिद के हौसले देखकर इतना तो संकेत मिलता है कि जिस लडकी के अन्दर प्रतिभा हो, आगे बढने का जुनून हो और खुद पर विश्वास हो उसे दुनिया का कोई नियम , कोई फतवा,कोई धमकी और कोई भी परिस्थिति रोक नही सकती।

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