नेता और दुष्कर्म

भारत में कुछ गिने चुने ही नेता होंगे जिनकी छवि साफ सुथरी होगी वरना हर नेता के ऊपर दुष्कर्म से लेकर घोटाले से सम्बन्धित कोई न कोई मुकदमा चल रहा होता है लेकिन इन नेताओं पर कोई फर्क नही पडता  क्योंकि इनके पास पैसे और पावर जैसे अस्त्र शस्त्र होते हैं जिनके आगे पुलिस और अदालतें सब मजबूर हो जाते हैं । अगर आप नेता बन गये तो समझ लीजिए कि आपको अपराध पे अपराध करने का लाइसेंस मिल गया।
  अभी 16 मार्च 2017 को सपा के पूर्व मंत्री गायत्री प्रजापति को सामूहिक दुष्कर्म के आरोप में गिरफ्तार किया । हालाँकि उन पर यह आरोप कई दिन पहले ही लगाया गया था लेकिन आरोप के तुरन्त बाद से ही ये फरार चल रहे थे ।उनका फरार होना ही यह साबित कर देता है कि वह सचमुच आरोपी हैं और ताज्जुब की बात देखिए जब तक चुनाव पूरे नही हुए पुलिस इनको खोज भी नही पाई। आखिर खोज भी कैसे पाती उत्तर प्रदेश में सपा की जो सरकार थी और गायत्री प्रजापति भी सपा के ही मंत्री थे। शायद मंत्री जी भी इसी सोच में थे कि किसी तरह चुनाव बीत जाए और सपा की फिर से सरकार बन जाए उसके बाद तो अपना ही राज होगा कोई क्या उखाड लेगा। यदि सपा जीत जाती तो शायद उनका यह सपना पूरा भी हो जाता क्योंकि सपा की सरकार में सिर्फ सपाइयों की ही चलती है। दुर्भाग्यवश मंत्री जी ने जैसा सोचा था वैसा हुआ नही और पासा उल्टा पड गया ।समाजवादी पार्टी हार गई और एक नयी सरकार बन गई।अब तक मंत्री जी की समझ में आ चुका था कि इससे पहले भाजपा सरकार अपने पूरी पावर में आए इससे पहले ही आत्म समर्पण कर देने में ही भलाई है।



कितनी अजीब बात है न कि जो पुलिस इतने दिन दबिश पर दबिश देती रही लेकिन मंत्री तक नही पहुँच सकी लेकिन जैसे ही चुनाव परिणाम आया और नई सरकार बनी वैसे ही पुलिस में पावर आ गई और मंत्री जी को किसी विदेश से नही  बल्कि यूपी की राजधानी लखनऊ से ही  गिरफ्तार कर लिया। जरा सोचिए कि अगर सपा की ही सरकार बन जाती तब क्या माजरा होता ?
क्या मंत्री जी को गिरफ्तार किया जाता , शायद नही।
अब भी कुछ नही कहा जा सकता कि मंत्री जी को सजा मिल ही जाए कारण यह है कि वह एक तो नेता हैं दूसरे पैसे वाले भी हैं, तीसरा भारत में अदालतें सिर्फ पैसे और पावर वालों के पक्ष में ही ज्यादातर फैसले सुनाती हैं और चौथा कानून का डण्डा सिर्फ गरीबों और निर्दोषों पर ही बरसना जानता है।
यहीं से सवाल उठता है हमारे देश की कानून व्यवस्था पर और सत्तारूढ सरकार की मंशा और योग्यता  पर ।क्या सारे नियम और कानून सिर्फ आम आदमियों के लिए हैं। जब एक आम आदमी पर कोई झूठा आरोप भी लग जाता है तो पुलिस प्रशासन इतना एक्टिव हो जाता है कि जल्द से जल्द आरोपी को गिरफ्तार कर लिया जाता है और उसके साथ ऐसा व्यवहार किया जाता है जैसे वह कोई आतंकवादी हो। वहीं दूसरी तरफ जब किसी वीआईपी या नेता पर कोई आरोप लगता है तो पुलिस प्रशासन का व्यवहार बदल जाता है। अगर जनता ने उनकी गिरफ्तारी के आन्दोलन करना शुरू कर दिया तो भी प्रशासन आरोपी को गिरफ्तार करने के बजाय जनता पर ही आँसू गैस और लाठी चार्ज का प्रयोग करना शुरू कर देता है। कितना अजीब लगता है कि आरोपी न होते हुए भी एक आम इंसान को जेल में कन्फेशन के लिए जमकर मारा पीटा जाता है और थर्ड डिग्री का इस्तेमाल किया जाता है जबकि एक नेता या वीआईपी जिस पर आरोप तय है उसे गिरफ्तार करने की भी हिम्मत नही करता पुलिस प्रशासन।यदि गिरफ्तार भी करने जाता है तो पहले आरोपी नेता या वीआईपी की इजाजत लेता है कि " सर हम आपको गिरफ्तार करने आ रहे हैं ,आएं कि नही या आप सावधान हो जाएं या शहर से बाहर चले जाएं।"
अगर किसी आम चोर ने किसी की साइकिल चुरा ली हो और थाने में उसकी रिपोर्ट दर्ज करा दी गई हो तो तब देखिए पुलिस कितनी तेजी से अपना काम करती है । हर दिन हर रात उस आरोपी साइकिल चोर के घर और गांव में ऐसे दबिश की जाती है जैसे उसने भारत का सरकारी खजाना ही लूट के अपने घर रख लिया हो। ये दबिश तब तक जारी रहेगी जब तक कि साइकिल चोर को गिरफ्तार नही कर लिया जाता और उससे उसका जुर्म  कबूल नही करवा लिया जाता। इसके बिपरीत हमारे देश की राजनीति में एक से बढकर एक बडे बडे चोर  बैठे हैं जिन्होंने करोडों अरबों का घोटाला करके देश का पैसा विदेशी बैंकों में जमा कर रखा है उनके घर सब कुछ जानते हुए भी कोई कभी तफ्तीश करने नही जाता।अगर कभी मीडिया वालों ने बडे पुलिस अधिकारियों से इसके बारे में सवाल भी कर लिया तो जवाब मिलता है कि हम मजबूर हैं हमें ऊपर से परमीशन नही है।  अब हम पूछते हैं कि गरीबों पर कार्रवाही करने के लिए आपको परमीशन कैसे मिल जाती है, सिर्फ इसलिए कि गरीबों के पास पावर नही है या पैसा नही है?
हम पूछते हैं कि इन अमीरों और नेताओं पर आरोप साबित हो जाने के बाद भी इनको इतना स्पेशल ट्रीटमेंट क्यों दिया जाता है ? आखिर एक आरोपी तो आरोपी ही होता है। एक  ही देश में दो लोगों के साथ, एक ही अपराध के लिए अलग अलग व्यवहार क्यों किया जाता है। अभी कुछ दिन पहले एक सुप्रीम कोर्ट के एक जज ने कहा था कि अगर आपकी जेब में पैसे नही हैं तो भारत में आपको न्याय की उम्मीद नही करनी चाहिए। जज साहब का यह वक्तव्य सिर्फ एक वक्तव्य नही बल्कि एक सवाल है कि क्या न्याय सिर्फ अमीरों के लिए है? क्या न्याय भी बिकता है या खरीदा जा सकता है?  अगर हाँ , तो यह दुर्भाग्य है भारत और भारत के गरीबों का। अगर न्याय सिर्फ अमीरों के लिए है तो गरीब कहाँ जाएं और कौन सा दरवाजा खटखटाएं।
कहने को तो भारत एक लोकतांत्रिक देश है यहां जनता का राज है जबकि सच तो यह है कि आम जनता का सिर्फ इस्तेमाल किया जाता है । अमीरों और गरीबों जो अन्तर 50 साल पहले था वह आज भी मौजूद है ।आज भी गरीब.सिर्फ वोट देने के लिए ही हैं न्याय पाने के लिए नही।अगर गरीब और गरीब में किसी तरह का विवाद है फिर तो उनमें से किसी न किसी गरीब को न्याय मिल सकता है परन्तु अगर  विवाद एक अमीर और एक गरीब के बीच का है तो गरीब को न्याय नही मिल सकता इस देश में।
पुलिस वाले कहते हैं कि जनता सिर्फ उनसे डरती है इज्जत नही करती ।करेगी भी कैसे अजी आज तक आप लोगों ने सिर्फ मजबूर आम जनता को ही तो परेशान किया है , हमेशा एक आम बाइक वालों की ही चेकिंग की है, कभी किसी वीआईपी या नेता की भी गाडी चेक नही जबकि सारे गलत काम यही लोग करते हैं।
याद रखिए जब तक यह न्यायिक भेदभाव दूर नही होगा तब तक पुलिस प्रशासन की छवि आम आदमी की नजरों में नही सुधरेगी।

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