रिश्ते और हमारा ईगो
एक इंसान न जाने कितने रिश्तों से बँधा होता है और हर रिश्ते को अच्छी तरह निभा पाना सबके बस की बात भी नहीं होती। रिश्तों का जो जाल होता है वह बना ही कुछ इस तरह से होता है कि अगर एक धागे में किसी तरह की हरकत की जाती है तो आस पास के धागों में अनावश्यक रूप से तनाव आने लगता है। एक इंसान के पक्ष में बात करो तो दूसरा इंसान नाराज होने लगता है, दूसरे की हित की बातें करो तो तीसरे को आपत्ति होने लगती है। आखिर एक सामान्य इंसान करे तो क्या करे। उसके सामने तो दोनों ही स्थितियों में धर्म संकट की ही स्थिति है, न तो वह पूरी तरह सबको नाराज ही कर सकता है और न ही एक साथ सबको खुश ही रख सकता है। जो इंसान इन रिश्तों की उलझन में एक बार फँस गया तो समझो वो फँस ही गया, वह कभी भी इस उलझन से आसानी से बाहर नही आ पाता। उसी तरह जो इंसान इन रिश्तों में सामंजस्य करना जान गया वो कभी भी उलझ नही सकता और ऐसे ही इंसान को हम सुलझा हुआ इंसान कहते हैं।
क्या आप जानते हैं दुनिया में सुलझे हुए इंसानों की संख्या बहुत ही कम होती है।अगर आप दिन भर में 100 लोंगों से मिलेंगे तो उसमें से पाँच या 10 ही ऐसे लोग मिलेंगे जिन्हें बात करने का सलीका आता है और जो आपकी किसी गलती पर भी आप के ऊपर झल्लाते नही है। याद रखिए कि जो इंसान हर तीसरी बात पर झल्लाता है या गुस्सा करता है वह जीवन में कभी भी रिश्तों की एहमियत समझ ही नहीं सकता क्योंकि ऐसे इंसानों का दिमाग स्थिर ही नही रहता और दिमाग एक जगह केन्द्रित नही होगा तो वह हर एक बात और घटना को खण्डित रूप में ही देखेगा अर्थात् पूरी बात सुनने समझने से पहले ही अपना रिएक्शन दे देगा। ठीक उसी तरह जैसे आपको कोई कहानी खण्ड खण्ड करके पढने को दे दी जाए और हर खण्ड पढने से पहले ही आपसे कहानी का सार या परिणाम पूछ लिया जाए तो आप क्या करेंगे? निश्चित रूप से आप झल्ला उठेंगे। कहने का मतलब इतना ही है कि सिर्फ कहने में बडाई नही होती, बल्कि सामने वाले की बात भी सुनना भी जरूरी है।
एक इंसान तभी इंसान कहा जाएगा जब उसमें कहने के साथ साथ सुनने की भी क्षमता हो। ऐसे लोगों की कमी नही है जो दूसरों को तो बोलियाँ बोलते हैं ताने मारते हैं लेकिन अगर उनको कोई कुछ कह दे तो उन्हें बहुत बुरा लग जाता है। अगर ऐसे लोग महसूस कर लें कि जिस तरह से बुरी बातें उन्हें अच्छी नहीं लगती ठीक वैसा ही दूसरों के साथ भी होता है तो शायद वो दुबारा किसी को कडवी बातें न कहें।
मीठी बातें:
अगर आप बोलने में ही ज्यादा यकीन करते हैं तो कोशिश कीजिए कि आपके मुँह से मीठी बातें ही निकलें क्योंकि आपके मुँह से जितनी मीठी बातें निकलेंगी आपके कानों को भी उतनी ही मीठी बातें सुनने को मिलेंगी। अगर आप घर में सबसे बडे है तो आपकी हर एक क्रिया प्रतिक्रिया का असर पूरे परिवार पर पडता है और आप ही अगर कडवी बातें बोलना शुरू कर देंगे तो यकीन मानिए आपके परिवार का कोई भी सदस्य खुश नही रह सकता ।आप घर के बडे हैं या मुखिया हैं तो आप एक बडी नदी की तरह हैं जिसके पानी से बहुत सारे खेतों में फसलें उगती हैं। जब तक नदी स्वच्छ पानी खेतों तक पहुँच रहा हैं खेतों में फसलें अच्छी ही होंगी लेकिन किसी वजह से अगर नदी का पानी दूषित हो जाता हैं तो खेतों में कुछ भी नही होगा । इसलिए खुद को हमेशा दूसरों के लिए आदर्श बना के रखिए ताकि लोग आपके करीब रहकर आपसे कुछ सीखें न कि आपसे दूर भागें।
हम सब चाहते हैं कि लोग हमारी इज्जत करें लेकिन जैसे ही हमें मौका मिलता है किसी दूसरे की बेइज्जती करने से भी नही चूकते। भले ही हम समझते हैं कि हमने तो हँसी मजाक में ही फला इंसान की खिल्ली उडाई है मगर खिल्ली तो खिल्ली ही होती है ,क्या पता उस इंसान को बुरा तो लगा हो लेकिन वह चुप रहा । हो सकता वह हमारी आपकी कुछ ज्यादा ही इज्जत करता हो इसलिए कुछ कह न सका लेकिन आप सोचिए कि वह कब तक हमारी इज्जत करेगा ?जिस दिन उसके सब्र का बाँध टूटेगा वो उल्टा हमारी भी बेइज्जती कर सकता है। इसलिए अगर इज्जत पानी है तो दूसरों को भी इज्जत देना सीखिए। चाहे कोई हमसे छोटा हो या बडा सबसे हम अच्छे व्यवहार की ही उम्मीद करते है तो क्या हमारा फर्ज नही बनता कि हम भी उन सब से अच्छा व्यवहार ही करें। किसी से प्यार और इज्जत से बात करने में जाता ही क्या है जितना प्यार और इज्जत हम खर्च करते हैं उससे कहीं ज्यादा तो हमें मिल भी जाता है।
जो इंसान कडवी और दिल तोडने वाली बातें करता है उससे आए दिन कोई न कोई नाराज या गुस्सा होता रहता है।उस पर अगर उसमें किसी रूठे हुए को मनाने की कला नहीं है फिर तो और भी मुश्किल हो जाती है।एक तरफ तो मनाना नही आता उसपे कडवा बोलने की आदत , दोनों कमियाँ एक से बढकर एक है ।एक दिल जोडने में बाधक तो दूसरी दिल तोडने में माहिर।एक इंसान जो झुकना नही जानता वो किसी को मना नही सकता।कुछ ऐसे लोग भी मिलेंगे जिनका अगर अपनी पत्नी से भी मतभेद हो जाए तो महीनों तक बातचीत नही होती जब तक कि खुद बेचारी पत्नी बातचीत शुरू न करे।मुश्किल तो तब और भी हो जाती है जब पति और पत्नी दोनों में ईगो की भावना हो और दोनों में से कोई भी झुकने को तैयार न हों ।ऐसे लोगों की सुलह तो तब तक नही होती जब तक कि कोई तीसरा आकर मध्यस्थता न करे।
मेरी तो समझ में नहीं आता कि लोग अपनों के सामने झुकने में क्यों बेइज्जती महसूस करते हैं? क्या हमारा घमण्ड या ईगो हमारे अपनों से भी बढकर है? हम जिन्दगी भर कोशिश करते हैं कि हमारे जो अपने हैं ,चाहे माँ बाप हों , पत्नी हो , बच्चे हों या भाई बहन हों वो हमेशा हमारे पास रहें तो यही लोग जब किसी बात पर खफा हो जाते हैं हम ईगो दिखाने लगते हैं और सोचते हैं कि अरे हम क्यों मनाएं हमने थोडी गलती की है या हम किसी से कम थोडी हैं।ऐसा सिर्फ पति पत्नी में ही नही होता है बल्कि सास-बहू,भाई-भाई, भाई-बहन, दोस्त-दोस्त, पिता-पुत्र और लगभग हर रिश्ते में कभी न कभी ईगो बाधक बनता ही है इसलिए अपने ईगो को दिल से निकाल फेंकिए और अपने कीमती रिश्तों को बचा लीजिए।
अगर रिश्तों की परवाह है तो कभी कभी हमें बिना गलती के भी झुक जाना चाहिए इसमें कोई छोटापन नही हैं।झुकने से एक तो हमारे अपने मान जाते हैं और दूसरी बात कुछ दिन के बाद जब उन्हें महसूस होने लगेगा कि आपकी गलती न होने के बावजूद भी आपने अपनी गलती स्वीकार की थी और वो भी सिर्फ उनकी खुशी के लिए ,तो यकीन मानिए आपकी इज्जत उनकी नजरों में कई गुना बढ जाएगी और दुबारा जब भी वो रूठेंगे तो आपको मनाने में ज्यादा मुश्किल नही होगी। अगर हमारे थोडा सा नरम हो जाने से या झुक जाने से रिश्ते सम्भल जाते हैं तो इससे बडा बडप्पन तो हो ही नही सकता।
हमारा ईगो हमारे काम बिगाडने के शिवा हमारे किसी भी काम नही आ सकता अगर काम आ सकते हैं तो सिर्फ हमारे अपने और अपनों से हमारे रिश्ते। हमारा दिल तो कहता है कि चलो अपनों के पास चलते हैं लेकिन हमारा ईगो हमारे दिल और मन पर भी हावी होता है और उनकी आवाज हमारे मस्तिष्क तक पहुँचने ही नही देता। जब तक हमारे दिमाग तक हमारे मन या दिल की आवाज नही पहुँचेगी हम कुछ भी कर या सोच नही कर सकते।अगर हमें अपने मन की करनी है, अपने दिल की करनी है तो सबसे पहले हमें अपने अन्दर से उस ईगो को बाहर करना होगा जिसने हमें और हमारी सोच को अपना गुलाम बना के.रखा है।आइए,हम हम सब इस गुलामी से खुद को और अपने दिल को आजाद करते हैं और अपने बिखरे हुए रिश्तों को समेटकर एक साथ करते हैं।
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