हमारी बेटियाँ

हमारे भारतीय समाज में हमेशा से ही नारी को अपने आत्म सम्मान के लिए संघर्ष करना पडा है।प्राचीन काल से ही नारी को अबला ,असहाय और कमजोर समझा गया है और आज वर्तमान समय जो पहले से बहुत आगे बढ चुका है,में भी नारियों की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है।आज भारत में पढे लिखे शिक्षित लोगों के होने के बावजूद भी ऐसे लोगों की संख्या बहुत ही कम है जो अपनी बेटियों को अपने बेटों के बराबर समझते है।

सच पूछिए तो आज भी लोगों के दिलो दिमाग में पुराने रूढिवादी सिद्धान्तों ने घर कर रखा है ।आज भी पढे लिखे लोगों का एक तबका ऐसा है जो समझता है कि बेटियाँ सिर्फ बोझ होती हैं और बेटे घर को रोशन करने वाले चिराग।इसीलिए पुत्र प्राप्त करने के लिए लिंग की जांच करवाई जाती है हालाँकि भारत सरकार इसकी बिल्कुल भी इजाजत नहीं देती फिर भी कुछ डाक्टर या विशेषज्ञ कुछ पैसे की लालच में लिंग जांच कर रहे हैं और रूढिवादी सोच रखने वाले लोगों से कोख में ही मासूम बच्चियों की हत्या करवा रहे हैं।

हर साल न जाने कितनी मासूम जिन्दगियाँ सिर्फ इसलिए कोख में ही मार दी जाती हैं क्योंकि वो बेटियाँ होती हैं। आखिर कब बदलेगा हमारा समाज ? कब समझेगा कि बेटियां बेटों से भी बेहतर साबित हो सकती हैं ? सरकार ने इसके लिए कडे कानून जरूर बनाए हैं पर फिर भी ये कडे कानून हमारे देश में बच्चियों को बचा नहीं पा रहे हैं उसकी मुख्य वजह है पुरानी सोच रखने वाले लोग।जब तक हमारे समाज में रहने वाले लोगों की सोच नहीं बदलेगी हम कितने भी कानून बना ले बेटियों की जिन्दगी पर खतरा बना ही रहेगा।

फिलहाल भारत सरकार और राज्य सरकारों ने तरह तरह की योजनाएं चलाकर इस दर्दनाक प्रथा पर प्रहार किया है ।अब तो ऐसी भी योजनाएं चलायी जा रही हैं जिनमें बेटियों के जन्म पर भारत सरकार द्वारा माता पिता को प्रोत्साहन राशि दिए जाने का प्रावधान है। भारत सरकार अपना काम कर रही है लेकिन अब हम युवाओं को भी एक जिम्मेदारी के साथ आगे आना होगा और ज्यादा नहीं तो कम से कम अपने परिवार और पडोस को जागरुक करना होगा और उन्हें बताना होगा कि किस तरह से यह प्रथा मानवता को शर्मशार कर रही है।अशिक्षित लोगों के बीच शिक्षा के दीप जलाने होंगे और कन्या भ्रूण हत्या के सम्बन्ध में भारत सरकार द्वारा बनाए गये नियमों,कानूनों  और योजनाओं से सबको अवगत कराना होगा।


बेटे सुख देते हैं तो बेटियाँ भी खुशी हैं

बेटे गर दीपक हैं तो बेटियाँ रोशनी हैं

आज अगर आप देखेंगे तो किसी भी क्षेत्र में लडकियाँ लडको से पीछे नहीं हैं ।घर के कामों को देखने साथ साथ वे पढाई भी कर रही है और हर एक प्रतियोगिता,खेल और आयोजनों में बढ चढ के हिस्सा ले रही हैं।यहाँ तक पुराने समाज में पहले जो काम और खेल सिर्फ पुरुषों के लिए समझा जाता था आज उन सब कामों और खेलों में लडकियों की भरपूर भागीदारी है । चाहे भारतीय सेना की बात हो या कुश्ती या कबड्डी के खेल का हर जगह लडकियाँ अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही हैं और सिर्फ उपस्थिति दर्ज नही करा रही हैं बल्कि लडकों से कहीं अच्छा प्रदर्शन भी कर रही है।आज देश की कोई भी  बडी से बडी परीक्षा हो बेटियां हर तरह से अव्वल आ रही है, बडे से बडे पद पर बेटियां विराजमान है तो फिर बेटियों से इतनी नफरत क्यों है ? क्यों इतना भेदभाव है हमारे समाज में ?   इसलिए अपनी सोच बदलिए और अपनी बेटियों की क्षमता को पहचानें और उन्हें मौका दें कुछ कर दिखाने का। अगर आप बेटियों भरोसा दिखाएंगे और उन्हें आगे बढने का मौका और सुविधाएं देंगे तो लडकियों के बारे में  आपकी सोच बदल जाएगी और आप मान जाएंगे कि बेटियां बेटों से किसी भी मामले में कम नहीं हैं। 




कविtता-----

जन्म हुआ बेटी का
जैसे मरन हुआ है किसी काऐसा आलम है घर मे

मुँह लटका है सभी का

थोडी बडी हुयी बेटी
चिँता लगी सताने
कैसे होगा ब्याह सोचकर
सिर लगा बाप खुजलाने 

कोस रहा है माँ को
क्यों बेटी जन्मी तूने
कहाँ से आयेगा दहेज 
हर चीज के दाम हुए दूने
जैसे तैसे ब्याह हुआ 

और गयी बेटी ससुराल
सुनकर ताने सास ननद के
हुआ बुरा फिर हाल
सास कहे आराम न कर तू
काम करा कर तेज
ननद कहे कि आखिर तू 
कम क्योँ लायी दहेज
बीता समय हुयी गर्भवती जब
फिर से यही दबाव कि
कुछ भी करना बेटी न जन्मना
बेटा होगा तो होगा रोशन घर का नाम
बेटी आयी तो बिगडेगा बनता सारा काम
आखिर हुआ जनम फिर बेटी का
सभी हुये हलकान

सिर पे रख के हाथ

आज फिर

है पूरा घर परेशान

माँ रोये दिन रात सोचकर 
सिर्फ एक ही बात 

होगा वही फिर बेटी सँग
जो हुआ था मेरे साथ

आखिर कब बदलेगी सोच जमाने की
कब होगी कम लालसा बेटा पाने की

कब तक कोसी जायेँगी ये प्यारी बेटियाँ

बेचारी बेटियाँ ।

                           ##
कितना मुश्किल होता है लोगों को समझाना
बेटी अगर नहीं होगी तो कैसे चलेगा जमाना
                         ##


जिस घर में बेटी नहीं होती
उस घर में खुशी नहीं होती
और जिस घर में खुशी नहीं होती
उस घर की जिन्दगी जिन्दगी नहीं ह़ोती
ए बेरहम जमाने वालों
क्या तुम्हें दर्द नहीं होता
अपनी ही बच्ची को कोख में मारते हुए
क्या इतनी फिकर रहती है तुम्हें वंश की
कि जान ही ले लेते हो 
अपने ही अंश की
जरा सोचो कोख में पल रही मासूम के बारे में
जब उसे लगता है कि उसे खतरा
है किसी चीज से 
तो सिकुड जाती है खुद में
उसे यकीन रहता है कि उसकी माँ 
बचा लेगी हर आफत से
लेकिन जब उसे पता चलता होगा
कि उसके माँ बाप ही बनने वाले है  है कातिल उसके
जरा सोचो वो किसको पुकारती होगी
हाय कितना दर्द सहती होगी
अरे बेदर्द जमाने
बेटों से इतना प्यार क्यों है
आखिर बेटियों से इनकार क्यों है
तुम्हारे प्यार के गुलशन में खिलने वाली कली 
गुलाब की ही है
मत मारो बेटियों की आखिर 
वो भी तो बच्ची 
आपकी ही है....


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