भारत में चुनाव-30 दिन का लोकतंत्र

इस समय यूपी में चुनाव का माहौल गरम है।
हर कोई नेता जनता की नजर में अपने आपको बेहतर साबित करने की कोशिश कर रहा है।
ऐसे में  नेता लोग एक एक करके जनता के बीच पहुँच रहे है ठीक उसी तरह जिस तरह बरसात के आते ही बरसाती मेढक बाहर आ जाते हैं और जैसे ही बरसात खतम हो जाती है सारे मेंढक कहाँ गायब हो जाते हैं पता ही नहीं चलता।आज आलम यह है कि जिस गली नेता जी के चमचे भी जाना पसन्द नहीं करते वहाँ भी बडे बडे नेता हाथ जोड के खडे हैं और जनता से उसकी तकलीफों के बारे में पूछ रहे है और आश्वासन दे रहे है कि हर गाँव हर इंसान की समस्या उनकी अपनी समस्या है जिसे चुनाव जीतने के तुरन्त बाद दूर कर दिया जाएगा।वा

ह क्या नजारा होता है देखने लायक ...इसी 20 से 30 दिनों तक महसूस होता है कि  भारत में वास्तव में लोकतंत्र है, जनता मालिक है और नेता उसके सेवक।लेकिन बेचारी भोली भाली जनता को यह नही मालूम कि वह सिर्फ 20-30 दिनो के लिए ही राजा है और नेता उसके सेवक क्योंकि चुनाव परिणाम आने के बाद अगले 5 साल जनता से कोई पूछने तक नही आयेगा कि भाइयों बहनों आप सब कैसे हो, समस्या दूर करने की बात तो बहुत दूर की है।

आज हर पार्टी का हर नेता सिर्फ लालच देकर वोट पाना चाहता है,रिश्वत दी जा रही है अप्रत्यक्ष रूप से।कोई स्मार्टफोन दे रहा है तो कोई लैपटाप ... लेकिन किसी ने शिक्षा का स्तर सुधारने की बात नहीं की।10 साल पहले पढाई में  45℅ हासिल करने वाले छात्रों को वो सब आता था जो आज के 95% हासिल करने वालों को भी नहीं आता..क्यों?कुछ लोग कह रहे हैं किसानों का ऋण माफ कर देंगे ,अजी पहले योग्य किसानों को ऋण दीजिए तो सही।

कानून व्यवस्था का तो पूछिए ही मत ...अपराध , बलात्कार का ग्राफ तो बस ऊपर ही चढता जा रहा है। अगर बहुत दबाव में कोई अपराधी पकड में आ भी गया तो पता चला कि वह तो नेता जी का साला या साढू है...लो भइया उसे भी छोड दिया।
ये तो हाल है अपने देश प्रदेश का।
कभी कभी तो जब नेता लोग जनता के बीच हाथ जोडकर खडे होते है और अपनी लुभावनी बातों में भोली भाली जनता को फँसा रहे होते हैं तो मुझे ऐसा महसूस होता है कि मानो वो कह रहो कि " अरे वेवकूफ जनता आज मैं तुम लोगों के सामने हाथ जोडकर वोट मांग रहा हूँ  याद रखना अगले 5 साल तुम सब मेरे आलीशान मकान के आगे दिन भर हाथ जोडकर खडे रहोगे फिर भी मैं अपने मकान से बाहर नहीं आऊंगा। आज तुम सब राजा हो अगले 5 साल तक मै राज करूंगा, मुझसे और मेरे रिश्तेदारों से अगर कुछ बचेगा तो कुछ दे दूंगा तुम लोगो को भी....फिर भी उम्मीद में मत रहना कि दे ही दूंगा।"

अगर सही से देखा जाए तो बेचारी जनता कर भी क्या सकती है वह तो इतनी भोली होती है पिछले 5  साल का दर्द, नेता जी की 20-30 दिनों की लुभावनी बातों में आकर भूल जाती है और अगले नेता जी के हाथों में अपना  अगले 5 साल  का भविष्य सौंप देती है।पता चलता है ये नेता जी तो पहले वाले नेता जी के भी गुरू निकले।अगर नेता जी द्वारा थोडा बहुत जो विकास कार्य होता भी है तो वह नगरों तक सीमित रह जाता है ।गाँव, जहाँ पर वास्तव में विकास,सुविधाओं की जरूरत है वहाँ पर कोई झांकने तक नहीं जाता।अगर कोई योजना आ भी गई गांव तक तो ऊपर से लेकर नीचे के अधिकारी, ग्राम प्रधान में बन्दरबाँट हो जाती है।जनता के लिए क्या बचा...बाबा जी का ठुल्लू।

हर बार...हर बार जनता के साथ यही धोखा होता है हर बार जनता छली जाती है और भ्रष्ट नेता जनता के पैसों से ही ऐश करते हैं और बेचारी जनता विकास के स्थान पे दुख ही भोगती है उधर नेता 24 घण्टे  ए.सी. में सो रहे होते हैं इधर जनता को कैरोसीन भी मिलने में परेशानी।अब तो ऐसा लगता है कि भारत में लोकतंत्र है जरूर लेकिन चुनाव की तारीख तय होने से चुनाव का परिणाम आने तक.... सिर्फ 25-30 दिन का 

मेरे देश के भोली भाली जनता....

चुनाव के समय में ऐसी कोई पार्टी नहीं होगी जो आपको बहला फुसला कर, तरह तरह के लुभावने सपने दिखाकर आपका वोट न लेना चाहती हो लेकिन याद रखिए आपका वोट बहुत ही कीमती है ।

अपने एक वोट की कीमत और ताकत पहचानिये और अपना ये वोट सही जगह इस्तेमाल करें ।आपके एक एक वोट पर ही आपका और आपके क्षेत्र का भविष्य टिका है।

मैंने अक्सर गांव में सुना है कि जब  दो चार महिलाएं एक जगह इकठ्ठी होती हैं और वोट देने की बातें या चर्चा होती है तो कम पढी लिखी महिलाएं कहती हैं कि हम क्यों वोट देने जाएं क्या फायदा है इससे ,एक तो अपना काम रोको फिर जाओ घण्टों लाइन में खडे होकर इन्तजार करो जब बारी आए तो जाओ वोट दो इससे अच्छा घर पर ही रहकर  घर का कुछ काम ही कर लें। ऐसा सिर्फ इसलिए है कि उन्हें अपने एक वोट की कीमत मालूम नही है ,उन्हें नहीं पता होता कि उनका यही एक एक वोट देश और प्रदेश का भविष्य तय करता है । एक बार अगर सत्ता किसी गलत हाथों में चली जाए तो देश का कितना नुकसान होगा ये आप सोच भी नही सकते है।इसलिए इन भोली भाली अशिक्षित महिलाओं को यह जानकारी देनी आवश्यक है वो इस देश की नागरिक हैं उनका यह अधिकार और कर्तव्य है कि वो अपने लिए अपने मन की एक अच्छी सरकार चुनें और अपनी आने वाली पीढियों के लिए एक नये भारत का निर्माण करें।


वोट देकर हमें क्या मिलेगा वाली सोच बदलनी होगी।वोट देने का मतलब यह नही है कि तुरन्त ही कुछ हासिल हो जाए।गांव के भोले भाले लोगों की इसी सोच का फायदा कुछ नेता उठाते हैं और दारू तथा कुछ रुपये बांटकर वोट खरीदने की कोशिश करते हैं।

जो कि बिल्कुल भी असंवैधानिक है और इसे अधराध की श्रेणी में रखा जाता है तथा ऐसा करते हुए पकडे जाने जाने पर जुर्माने और कठोर दण्ड का भी प्रावधान है। ग्रामीण महिलाओं को यह बात समझानी होगी कि घर के काम उतने जरूरी नही हैं जितना जरूरी वोट देना है । घर के काम तो रोज होंगे लेकिन देश और अपना भविष्य बनाने अर्थात वोट देकर सरकार चुनने का मौका सालों में एक बार ही मिलता है।

इसके अलावा वोट के समय देश के नौजवानों की जिम्मेदारियां देश के प्रति और भी बढ जाती है क्योंकि आने वाला समय उन्हीं का है ।खासकर ग्रामीण इलाकों के नौजवानों को चाहिए कि अपने घर परिवार और आस पडोस के लोंगों को वोट का महत्व बताएं और वोट देने जाने के लिए प्रेरित करें तथा गांव के जो बूढे बुजुर्ग वरिष्ठ नागरिक हैं जो खुद वोट देने जाने के लिए सक्षम नहीं हैं उन्हें वोटिंग बूथों पर साथ ले जाकर वोट दिलवाए ।याद रहे कोई भी इंसान किसी भी अवस्था में हो उनका कीमती वोट व्यर्थ नही होना चाहिए।

वोट आपका अधिकार है

और वोट डालना आपका कर्तव्य भी।

आप अपने लिए वो नेता चुनें -----

1)जो अपने काम के प्रति ईमानदार हो जोकि सबसे ज्यादा जरूरी है।

2) जो चुनाव प्रचार के समय ही नहीं बल्कि  सत्ता में रहते हुए भी आपके क्षेत्र में आ सके और जन समस्याओं को सुन सके

3) जो वास्तव में जनता का सेवक हो

4) आपराधिक रिकार्ड वाले नेताओं को बिल्कुल वोट न दें भले ही वो कितने भी पावरफुल हो

5) जो जाति और धर्म को आधार बनाकर वोट मांगे वो तो बिल्कुल भी विश्वास योग्य नहीं है

6)बडे बडे वादे (जो पूरे नही हो सकते) करने वालों से बचें

7)  ऐसा नेता चुनें जो व्यावहारिक हो ,जिसके पास आप कभी मदद को जाएं तो कम से कम आपकी बात सुन सके

8) अगर पिछली बार की सत्तारूढ पार्टी का नेता जो आपके क्षेत्र में 5 साल तक नहीं आया वह वोट मांगने आता है तो उसे इस बार न चुनें क्योंकि अगर वो जीत भी गया तो पक्का अगले 5 साल फिर वो आपके क्षेत्र में नही आयेगा

9) आलसी और कामचोर को न चुनकर ऐसा नेता चुने जो विकास कार्यो हेतु हमेशा एक्टिव रहे

10) अच्छे चरित्र वाला प्रत्याशी चुनें।

और याद रखिए---

1) अपना वोट पैसे या दारू के लिए न बेचें  ये एक अपराध है

2) किसी की बातों में न आकर अपनी बुद्धि और विवेक का इस्तेमाल करें

3) कोई धमकाये या दबाव बनाए तो तुरन्त पुलिस को सूचित करें

4)सिर्फ अपना वोट डालें किसी दूसरे के नाम पर वोट डालने न जाएं क्योंकि ऐसा करके आप खुद को मुसीबत में डाल सकते है

5) वोटिंग के लिए जाते समय अपना पहचान पत्र साथ रखें

आप कोई भी प्रत्याशी चुनें

लेकिन वोट जरूर दीजिए

वोट न देकर आप अपना ही नुकसान करेंगे।

सारे काम रोक दें

सबसे पहले वोट दें

अधिकार से पहले कर्तव्य:

अक्सर आपने देखा होगा लोग चौराहे पर, घरों में या पंचायतों में राजनीति की बातें करते रहते हैं।

जब कुछ लोग आपस में मिलते हैं और राजनीति की बातें होती हैं तो जाहिर है कि वर्तमान सरकार की उपलब्धियों और नाकामियों का जिक्र होता है।

उसमें अक्सर लोग अपने अधिकारों की बातें करते हैं और तर्क या सुझाव देते हैं कि फला सरकार होती ये काम हो जाता या वो काम हो जाता ,जनता को ये अधिकार मिलना चाहिए या वो अधिकार चाहिए वगैरह वगैरह।

आपने गौर किया होगा कि अधिकारों की चर्चा तो सब करते हैं पर कर्तव्य के पालन की बात कम ही लोग करते हैं।

क्या आप जानते हैं कि किसी सरकार या उसकी  नीतियों पर सवाल उठाने का अधिकार किसको है ,अपने अधिकारों की बात करने का अधिकार किसको है?- निश्चित रूप से सिर्फ उसको जिसने अपने कर्तव्य का पालन किया है

और राजनीति में आपका सबसे महत्वपूर्ण कर्तव्य है मतदान करना।

अगर आपने मतदान प्रक्रिया में भाग नहीं लिया है तो आपको किसी सरकार की आलोचना करने का अधिकार भी नहीं होगा।

आप देश के नागरिक हैं देश आपसे अपेक्षा रखता है कि आप अपने बुद्धि और विवेक से एक ऐसी सरकार चुने जो देश को विकास के रास्ते पर लेकर जाए ।

एक अच्छा नेता चुनने के लिए आपका वोट देना जरूरी है।

इसलिए अपने इस महत्वपूर्ण  और अनिवार्य कर्तव्य का पालन करें और वोट देने जरूर जाएं।

वोट देकर कर्तव्य निभाएं

आओ अपना भविष्य बनाएं


भारतीय राजनीति में कमियां:

यूं तो हर देश की राजनीति में ऐसे नेता होते है जो चुने तो जाते है जनता की सेवा करने के लिए लेकिन वो अपनी  राजनीति के दांव पेंच का इस्तेमाल सिर्फ अपनी जेबें भरने के लिए करते हैं।
भारत में भी वैसी ही राजनीति है जिसकी कमियो को गिनाया जा सकता है---
1)अनपढ और अंगूठा छाप नेताओं की बहुलता
2)अपराधी प्रवृत्ति के बाहुबलियों कु अधिकता
3) ज्यादातर नेता भ्रष्ट 
4)वोट के लिए समाज को जाति धर्म बाँटना एक बडी कमी है
5)महिलाओं की कम भागीदारी
6)युवाओ की कम भागीदारी
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चतुर मुलायम सिंह की राजनीति:
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पिछले कुछ महीनों से सोशल मीडिया और भारतीय अखबारों में पिता पुत्र यानि मुलायम सिंह यादव और उनके पुत्र अखिलेश यादव के बीच होने वाले मतभेद की चर्चा चल रही है।हममें से काफी लोग पहले ही समझ चुके थे कि ये सिर्फ एक ड्रामा है लोगों का  ध्यान अपनी तरफ खींचने का लेकिन हम लोगों ने ये सोचा था कि ये सहानुभूति के जरिए वोट बनाने का चुनावी स्टंट है पर आखिर में जो परिणाम आया वह मुलायम के राजनीतिक अनुभव और चतुराई का सबूत प्रस्तुत करता है।वास्तव में नेता जी ने क्या गज़ब की राजनीति की है इस बार सच में मजा आ गया।और इस बार नेता जी ने राजनीति किसी दूसरी पार्टी के साथ नहीं बल्कि अपनी पार्टी के लोगों के साथ खेली है।

याद कीजिए वो समय जब अखिलेश को नेता जी ने मुख्यमंत्री बनाया था तो इसके पीछे उनका मकसद सिर्फ अपने बेटे भविष्य बनाना था चाहे कोई कुछ भी सोचे। वो जानते थे कि अगर ये सुनहरा मौका उन्होने गँवा दिया और किसी और को या खुद को मुख्यमंत्री बना लिया तो आगे के समय में अखिलेश का इस पद तक पहुँचना मुश्किल होगा।उनके इस.फैसले के लिए उनकी काफी आलोचना हुई थी

उस समय भी पार्टी के कुछ वरिष्ठ नेताओं को बुरा लगा था कि नेता जी ने अनुभवी और योग्य वरिष्ठ नेताओं के रहते एक कम अनुभवी अखिलेश को इतना महत्वपूर्ण पद सौंपा सिर्फ इसलिए कि अखिलेश उनके पुत्र हैं।आखिर पुत्र किसे प्यारा नहीं होता इसलिए मुलायम सिंह यादव ने सोचा  कि क्यों न अखिलेश को अपने जीते जी पार्टी का सर्वेसर्वा यानि राष्ट्रीय अध्यक्ष बना दिया जाए लेकिन सवाल फिर वही उठता कि पार्टी में अन्य वरिष्ठ अनुभवी और योग्य नेताओं के रहते अखिलेश को ही क्यों राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया जा रहा है ।

इसी तरह के विवाद और आलोचना से बचने के लिए नेता जी ने अपनी ही पार्टी के लोगों के साथ एक साफ सुथरी और सुरक्षित राजनीति खेलने की सोची।इसके लिए जानबूझकर पिता पुत्र ने आपस में मतभेद किए ।जो पार्टी के नेता मुलायम से खुश नहीं थे उन्हें अखिलेश ने अपने पाले में किया और जो नेता अखिलेश विरोधी थे उन्हें नेता जी ने अपने पाले ले लिया । लीजिए एक झूठी लडाई के लिये दो दल तैयार हो चुके थे और शुरू हुई एक राजनीतिक नौटंकी।पिता पुत्र ने एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप मढनें शुरु कर दिए और बीच बीच में ऐसे बयान भी दिए ताकि जनता को लगता रहे कि दोनों के  बीच कभी भी सब कुछ सामान्य हो सकता है और अन्त में दोनों साथ हो जाएं तो किसी को झटका न लगे।

लोगों और पार्टी के समस्त नेताओं को लगता रहा कि अखिलेश ने विद्रोह कर दिया है अपने पिता के साथ इसलिए नेता जी बेबस है कुछ कर नहीं पा रहें हैं इसके जरिए नेता जी को उन नेताओं सपोर्ट बना अखिलेश से कम खुश थे।उधर अखिलेश ने ज्यादा से ज्यादा विधायकों को अपने साथ करके अपनी ताकत और प्रभुत्व का प्रदर्शन किया ताकि पार्टी में उनके विरोधी लोगों को एहसास रहे कि भविष्य में भी सपा पर अखिलेश का ही दबदबा रहेगा।

उसके बाद बात आई चुनाव निशान पर कब्जा करने की यह आखिरी अध्याय था जिस में मुलायम सिंह ने भी अखिलेश का साथ दिया और पूरा मौका दिया चुनाव निशान कब्जा जमाने का।आखिर में अखिलेश की जीत हुई और उन्हें राष्ट्रीय अध्यक्ष बना दिया गया।अखिलेश के विरोधियों को लगता है कि अखिलेश के विद्रोह की वजह से नेता जी के हाथ में कुछ नहीं हैऔर इसलिए नेताजी की कहीं आलोचना भी नहीं हुईजबकि नेता जी ने वो कर ही दिया जो वो चाहते थे- अखिलेश को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाना।

देश के लोगों के लिए भले ही मुलायम सिंह अखिलेश से हार गए हैं लेकिन ये एक पिता की जीत हैअखिलेश ने भले ही कहा कि वो सिर्फ तीन महीने के लिए ही राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं उसके बाद फिर से नेता जी ही पार्टी के सर्वेसर्वा होंगे लेकिन अखिलेश ने अपने नाम के आगे राष्ट्रीय अध्यक्ष की मुहर लगवा ही ली है । इसका मतलब है कि भविष्य में नेता जी के बाद जब भी नया राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाने की बात होगी सबसे पहले अखिलेश यादव के नाम पर ही चर्चा होगी। मुलायम सिंह यादव ने यह राजनीति खेलकर अखिलेश का भविष्य पार्टी के सर्वेसर्वा के रूप में  सुरक्षित कर दिया हैऔर सबको यह बता दिया है कि जब तक उनका वंश चलेगा समाजवादी पार्टी पर उनके ही परिवार का अधिकार होगा चाहे पार्टी के अन्य कोई नेता कितना भी अनुभवी योग्य और वरिष्ठ क्यों न हो जाए।

Comments

  1. Bhai tum to blogger bn gye kya baat hai....

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