यूपी विधानसभा चुनाव-2017
उत्तर प्रदेश में इस समय चुनावी समर जारी है
जीत का सेहरा किसके सिर बंधेगा कुछ कहा नही जा सकता।इस समय ऐसी कोई पार्टी नही है जो जीत के लिए पूरी तरह निश्चिन्त हो।हर कोई सिर्फ बातों से अपने आपको विजयी घोषित कर रहा है लेकिन अन्दर ही अन्दर डर भी सता रहा है कि आगे जाने क्या होगा जनता किस तरफ घूमेगी कोई कुछ कह नही सकता। हर किसी पार्टी की कोई मजबूती है तो साथ ही साथ कोई न कोई कमजोरी भी है । जो व्यक्ति जिस पार्टी का समर्थक है अपनी उसी पार्टी को जीता हुआ मान रहा है जबकि सच यह है कि इस समय यूपी में वह माहौल है कि बडे से बडे चुनावी जानकार समझ नहीं पा रहे है कि जीत किसकी होनी है।बहुत से लोग तो यहाँ तक तय कर चुके हैं कि बहुमत से किसी की सरकार बन ही नही सकती है इसके पीछे लोगों का तर्क है कि जनता इस बार खुल के किसी एक पार्टी के समर्थन में नहीं है बल्कि बँटी हुई है। जो पार्टियां जहाँ पर अपना फिक्स वोट समझती थी वहाँ भी दूसरी पार्टियों के द्वारा सेंध लगाई जा चुकी है। बडे बडे को शूरमाओं को भी अपना अपना गढ बचाने के लिए काफी मशक्कत करनी पड रही है। फिलहाल हर पार्टी अपने अपने चुनावी घोषणा पत्र द्वारा जनता को अपनी तरफ करने में जुटी है ।अब किसकी मेहनत रंग लाएगी किसकी नइया डूबेगी ये तो चुनाव परिणाम आने के बाद ही पता चल सकेगा।
एक तरफ भारतीय जनता पार्टी है जिसकी इस समय केन्द्र में भी सरकार है ,अपना पूरा जोर लगा रही है जनता का विश्वास जीतने के लिए और उम्मीद कर रही है कि जिस तरह से लोकसभा के चुनाव में जनता ने एकजुट होकर उनका साथ दिया था काश विधानसभा चुनाव में भी फिर से वही करिश्मा हो जाए।लेकिन भारतीय जनता पार्टी वाले भी जानते हैं कि लोक सभा के चुनाव के समय माहौल अलग था उस समय मोदी की लहर थी और सब जानते थे कि नरेन्द्र मोदी में कडे और साहसिक फैसले लेने की भरपूर क्षमता है इसीलिए भाजपा को चुना गया लेकिन इस समय यूपी में कुछ दूसरा ही माहौल है यहाँ यह भी स्पष्ट नही है कि जीत के बाद भारतीय जनता पार्टी की तरफ से मुख्यमंत्री कौन बनेगा।एक तरफ सवर्ण समुदाय के अधिकतर लोग अगर भारतीय जनता पार्टी के साथ है तो मुस्लिम समुदाय जोकि इस चुनाव में निर्णायक भूमिका निभा सकता है वो भाजपा से बिल्कुल भी खुश नहीं है क्योंकि भारतीय जनता पार्टी के कुछ नेताओं और समर्थकों ने हमेशा ही मुस्लिमों के खिलाफ बयानबाजी की है शायद इसीलिए भाजपा की छवि मुस्लिम विरोधी बन गई है। इसके साथ ही आरक्षण एक ऐसा मुद्दा है जिसके बारे दलित और पिछडे समाज की एक धारणा बन गई है कि भारतीय जनता पार्टी आरक्षण को खत्म करना चाहती है और भाजपा के नेता और समर्थक भी समय समय पर आरक्षण विरोधी बयान देकर सुर्खियों में रहते हैं।
अब आती है बात समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के गठबंधन की।चूंकि ये दोनो पार्टियाँ डूबती हुई कश्ती की तरह हो चुकी थी ।कांग्रेस की हालत तो पहले से ही खराब थी और समाजवादी पार्टी भी पारिवारिक कलह के चलते टूटने के कगार पर थी। इसलिए दोनों पार्टियां अच्छी तरह से समझ चुकी थी कि अब अकेला चना भाड नही फोड सकता तो क्यों न दोनों एक साथ आ जाएं शायद थोडी बहुत इज्जत बच जाए या हो सकता है कि सरकार ही बन जाए।दोनों पार्टियों की जो अच्छाइयाँ हैं वो दोनों पार्टियों की कमजोरियों और नाकामियों से कहीं कम है।इसलिए यह गठबंधन सफल हो जाएगा इसमें संशय है। पिछली बार मुलायम सिंह यादव ने लैपटाप देने का वादा किया था तो इस बार अखिलेश यादव ने जनता को स्मार्टफोन का लालच देकर जनता को लुभाने का प्रयत्न किया है। वह मुस्लिम समुदाय और विद्यार्थी समुदाय जिसने पिछले विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी को बहुमत से नवाजा था दोनों ही इस बार इनसे नाराज है क्योंकि इन दोनों की उम्मीदों पर समाजवादी पार्टी खरी नही उतरी है। मुस्लिम कह रहे हैं कि अखिलेश ने उनके लिए 5 साल में कुछ किया ही नही तो अब क्या करेंगे। वहीं प्रतियोगी छात्रों (यादवों को छोडकर) का कहना है कि सपा उनके लिए ठीक नहीं है क्योंकि सिर्फ लैपटाप और स्मार्टफोन का लालच देने तक ही सीमित रह गई है।नौकरियों में भर्ती हेतु विज्ञप्ति तो निकलती है लेकिन भर्ती पूरी नहीं होती। 72825 शिक्षकों की भर्ती में इतने घोटाले और फर्जी काम हुए कि आज तक 5 साल हो गये भर्ती पूरी नही हुई और मामला आज भी अदालत में ही है ।इसके अलावा जो भी भर्तियों की विज्ञप्ति निकाली गयी उनमें से एक दो को छोडकर कोई भर्ती पूरी नही की गयी। सपा के पूरे शासन काल में ऐसी कोई भर्ती नहीं हुई जो अदालत में न गई हो। सपा की पारिवारिक कलह की वजह से उसकी छवि और भी धूमिल हुई है।
आइए अब बात करते है बहुजन समाज पार्टी की।बहुजन समाज पार्टी के आलोचक आलोचना करते हैं कि मायावती पैसों की भूखी हैं ,कई तरह के घोटालों में उनका नाम आता है, बसपा जनता का पैसा पत्थरों और मूर्तियों पर खर्च करती है , फिलहाल अपने नेताओं की मूर्तियां तो हर राजनीतिक पार्टियाँ बनवाती हैं वर्तमान समय में बहुजन समाज पार्टी की मजबूती है उसका सख्त शासन जोकि आज के समय में हर इंसान चाहता है, आज जब चोरी, लूट और बलात्कार अपने चरम पे हैं तब लोग इसी तरह की सरकार की उम्मीद करते हैं। अगर मुस्लिम समुदाय भाजपा और सपा कांग्रेस गठबंधन से खुश नही है तो ऐसी उम्मीद लगाई जा सकती है कि वह बहुजन समाज पार्टी को समर्थन दें ,ऐसा मेरा सिर्फ अनुमान है मैं दावा नहीं करता। इस समय छात्र समुदाय भी बसपा और भाजपा के ही साथ नजर आ रहा है।
कुल मिलाकर निष्कर्ष के रूप में सिर्फ इतना कहा जा सकता है कि इस बार के यूपी विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ही मजबूत स्थिति में नजर आ रही हैं । ये जनता को ही तय करना है कि कौन उसके लिए सर्वश्रेष्ठ है और कौन नही।
उत्तर प्रदेश को एक ऐसी सरकार चाहिए जो सिर्फ लैपटाप बाँटकर पल्ला न झाडे बल्कि शिक्षा के स्तर को भी सुधारे, जो सिर्फ युवाओ को रोजगार देने के सपने न दिखाए बल्कि दे भी,जो सिर्फ अपने आदमियों की फिक्र न करे बल्कि प्रदेश की हर आम जनता को एकसमान समझे।हमें एक ऐसी सरकार चाहिए जिसके शासन काल में हम और हमारी बेटियां और बहने सुरक्षित महसूस करें।
खैर, जीत किसी की भी हो हम और आप सिर्फ अनुमान लगा सकते हैं और उम्मीद कर सकते हैं कि इस उत्तर प्रदेश को एक ऐसी सरकार मिले जो सबसे पहले प्रदेश में फैली अराजकता,चोरी,लूट और बलात्कार जैसे अपराधों पर अंकुश लगाए और हमारे प्रदेश साफ और सुरक्षित रखे।
Update: 11 march 2017
चुनाव के दौरान जैसा कि हमने अनुमान लगाया था कि शायद बीएसपी और बीजेपी मजबूत स्थिति में होगी और किसी एक पार्टी को बहुमत मिल पाना मुश्किल होगा लेकिन हमारे अनुमान का बिल्कुल उल्टा हुआ है,हमने जिन दो पार्टियों पर अनुमान लगाया था उसमें से एक अर्श पर है दूसरी फर्श पर। आज चुनाव परिणाम आने के बाद जनता ने दो दशक बाद बीजेपी में विश्वास दिखाते हुए पूर्ण और प्रचण्ड बहुमत दिया है। जिस तरह से जनता में यह परिवर्तन दिखा है उससे लग रहा है कि जनता परिवर्तन चाहती है ।सपा और बसपा जो जाति और धर्म के आधार पर राजनीति करती है उन्हें जनता ने स्पष्ट रूप से यह संदेश दिया है कि अगर आने वाले समय में इन दोनों पार्टियों ने अपना राजनीतिक तरीका नही बदला तो इन्हें अपनी साख बचाने के लिए भी संघर्ष करना पडेगा।
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